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अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी शालू और अर्जुन साई से कोच के लिए प्रशिक्षित

अब कोच के रूप में ही अपना कॅरियर बनाने की तैयारी में विक्रम अवार्डी

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अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी शालू और अर्जुन साई से कोच के लिए प्रशिक्षित

अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी शालू और अर्जुन साई से कोच के लिए प्रशिक्षित

विदिशा. ताइक्वांडो के अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी और विक्रम अवार्ड से सम्मानित शालू रैकवार और अर्जुन रावत को हाल ही में नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्टस् भारतीय खेल प्राधिकरण(साई) बैंगलूरू से ताइक्वांडों के कोच के लिए प्रशिक्षित किया गया है। दोनों खिलाडिय़ों ने यह प्रशिक्षण पूरा किया है और अब वे भारतीय टीम के कोच बनने की पात्रता में शामिल हो गए हैं। अभी शालू विदिशा जिला खेल विभाग और अर्जुन सागर में पदस्थ हैं। उनका कहना है कि अब और बेहतर तकनीक से बच्चों को सिखाएंगे ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना बेहतर प्रदर्शन कर सकें।


पत्रिका से चर्चा में शालू रैकवार और अर्जुन रावत ने बताया कि उन्होंने यह प्रशिक्षण ऑन लाइन और ऑफ लाइन दोनों तरह से लिया और अब वे साई से एनआइएस के प्रशिक्षित हो गए हैं। अब वे टीम इंडिया के कोच की पात्रता में शामिल हो गए हैं। उन्होंने बताया कि इस प्रशिक्षण के माध्यम से वैज्ञानिक तकनीक से किस उम्र के खिलाड़ी को कैसे क्या सिखाना है यह भी जानने का अवसर मिला है। अब सुनियोजित योजना के तहत कोचिंग देने का तरीका भी समझ आया है। ये दोनों खिलाड़ी अब कोच के रूप में अपना कॅरियर बनाने में जुट गए हैं। शालू और अर्जुन ने अपने स्थानीय कोच और विश्वामित्र अवार्डी दिलीप थापा का जिक्र करते हुए कहा कि थापा सर ने विदिशा में ही रहकर हमें हर तरह की कोचिंग उपलब्ध कराने का प्रयास किया है। हमारे माता-पिता ने भी पूरी तरह हमें अपने कोच के हवाले कर दिया था कि अब ये ही तुम्हारे माता-पिता हैं, हम हस्तक्षेप नहंी करेंगे, थापा सर ने भी हर स्तर पर प्रयास किए इसी कारण हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर सके।

शालू ने कहा कि आजकल पहले जैसा माहौल नहीं रहा है। बच्चों को सख्ती से सिखाने के प्रयास में माता-पिता का हस्तक्षेप बढ़ा है, जबकि यदि माता-पिता एक हद से ज्यादा हस्तक्षेप करेंगे तो कोच ज्यादा कोशिश कर बच्चे के लिए बेहतर नहीं कर सकेगा। हमने अपने कोच से डांट ही नहीं खूब मार भी खाई है, लेकिन माता-पिता ने कोच को गुरू मानकर कभी कुछ नहीं कहा, यही कहा कि उन्होंने तुम्हारी गलती सुधारने के लिए ही किया होगा। वहीं अब बच्चे कोचिंग में खेल में आगे बढऩे की मंशा से कम और केवल अपनी फिटनेस और थोड़ा बहुत सीखने की मंशा से ही आते हैं। कोचिंग में हम लोग 5-7 घंटे तक देते थे, लेकिन अब एक-डेढ़ घंटा भी बच्चे मुश्किल से देते हैं, इसका असर खेल पर पड़ रहा है।

शालू का सफर...
कॉमनवेल्थ चैम्पियनशिप- 2010
विक्रम अवार्ड-2011
एशियन गेम्स- 2014
एशियन चैम्पियनशिप-2016
नेशनल स्पर्धाओं में- 8 गोल्ड मेडल
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अर्जुन का सफर....
विक्रम अवार्ड-2014
कोरिया में ओलंपिक का प्रशिक्षण
नेशनल स्पर्धाओं में 5 गोल्ड