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SHIV नगरी के नाम से विख्यात है नीलकंठेश्वर का धाम UDAIPUR

10 वीं शVidisha, Vidisha, Madhya Pradesh, Indiaताब्दी में इस मंदिर का निर्माण राजा भोज के पुत्र उदयादित्य ने कराया था

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SHIV नगरी के नाम से विख्यात है नीलकंठेश्वर का धाम UDAIPUR

SHIV नगरी के नाम से विख्यात है नीलकंठेश्वर का धाम UDAIPUR

विदिशा। विदिशा जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर उदयपुर भगवान नीलकंठेश्वर महादेव की नगरी के नाम से विख्यात है। अतीत में यह एक भव्य नगरी थी जिसके प्रमाण पूरे उदयपुर में आज भी चप्पे-चप्पे पर दिखे पड़े हैं। यह पूरा क्षेत्र महादेव के विशाल मंदिर के लिए जाना जाता है। 10 वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण राजा भोज के पुत्र उदयादित्य ने कराया था और उन्हीं के नाम से यह नगरी उदयपुर कहलाई। यहां भगवान शिव का भव्य शिल्प और स्थापत्य कला के प्रतीक के रूप में विशाल मंदिर है जिसका गगनचुंबी शिखर कई मील दूर से दिखाई देता है। उदयपुर का यह मंदिर विदेशी आक्रांताओ के जुल्मों से बचे खुचे मंदिरों में श्रेष्ठ है। मूर्तिकला, तोरण और मेहराबों के शिल्प से यह मंदिर अत्यंत भव्य एवं दर्शनीय बन पड़ा है। मंदिर का स्वरूप खजुराहो के मंदिरों की भांति है किंतु कई मायनों में यह और अधिक भव्य है। इस मंदिर में तीन द्वार है। गर्भ ग्रह में विशाल शिवलिंग मौजूद है, मंदिर का वास्तु इस प्रकार का है कि सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरण भगवान भोलेनाथ के गर्भ गृह में पहुंचकर उनसे पूरे जगत में प्रकाश फैलाने की आज्ञा सी मांगती नजर आती है। इतिहासकार निरंजन वर्मा के शब्दों में अलाउद्दीन खिलजी के सिपहसालार मलिक काफूर ने इस मंदिर को तोड़ने और मंदिर को ज्वलनशील पदार्थों से उड़ाने का प्रयास किया था पर यह संभव नहीं हो सका। इसका प्रमाण आज भी मंदिर के अंदर का हिस्सा पूरी तरह से काला दिखाई देने से मिलता है। सन 1775 में तत्कालीन भेलसा के सूबा खांडेराव अप्पाजी ने मंदिर के शिवलिंग पर पीतल का आवरण चढ़ाकर उसकी विधिवत प्राण प्रतिष्ठा की थी। बाद में ग्वालियर राज्य पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को अपने अधीन ले लिया और अब यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। यूं तो मंदिर भगवान नीलकंठेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है लेकिन इसके चारों ओर मंदिर के शिखर, हर कोण और दीवारों पर भगवान शिव, दुर्गा,गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, शिव के गण और तमाम देवी देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है। यहां आश्चर्यजनक रूप से गणेश के साथ गणेशी की प्रतिमा भी दिखाई देती है। मंदिर के शिखर के कुछ नीचे एक मानव की प्रतिमा है जिसे कई लोग मंदिर के मुख्य शिल्पकार तो कई लोग राजा उदयादित्य की प्रतिमा मानते हैं। मंदिर के प्रमुख द्वार पर प्रवेश करते ही मानव रूप में गंगा यमुना की प्रतिमाएं दिखाई देती है जो कि मंदिर में प्रवेश के पूर्व पवित्रता का प्रतीक है। सावन की पूरे महीने में यहां भगवान नीलकंठेश्वर महादेव के दर्शन करने दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। खासकर सावन सोमवार और महाशिवरात्रि पर यहां मेला सा लगता है और श्रद्धालुओं का जैसे सैलाब उमड़ पड़ता है। सुबह 4 बजे से भगवान भोलेनाथ के अभिषेक और दर्शन के लिए लोग पहुंचने लगते हैं। इसी मंदिर से मात्र 3 किलोमीटर दूर पहाड़ी की तलहटी में करीब 30 फीट लंबी भगवान नटराज की मोहक प्रतिमा मौजूद है जो एक ही शिला पर उकेरी गई है। इसके अलावा पूरा उदयपुर तालाब, बावड़ियों, मंदिरों और चहारदीवारी से गिरा हुआ नजर आता है। उदयपुर के सात द्वार अब भी अपने अवशेष के रूप में यहां मौजूद है। यहां पास ही प्राचीन किले के अवशेष भी मौजूद है।