
भात से शुरू होती है इनकी जिंदगी भात पर होती खत्म, स्थिति है ऐसी मरने से पहले ही खोद डालते हैं कब्र
नई दिल्ली। आज हमारा देश काफी आगे बढ़ चुका है। लोग हर चीज के प्रति जागरूक हो रहे हैं, देश में विदेशी कंपनियां निवेश कर रही हैं, लोग पढ़ाई या घूमने के लिए देश से बाहर जा रहे हैं, मॉल्स में विदेशी ब्रांड के सामान खरीद रहे हैं। इतने सबके बावजूद आज भी देश में कई ऐसे हिस्से हैं जहां विकास का प्रभाव ना के बराबर है। जहां लोग पिज्जा, बर्गर, पास्ता तक पहुंच चुके हैं वहीं एक जगह ऐसी भी है जहां के लोगों को भात या चावल के आगे कुछ पता ही नहीं। इन्हें भात के अलावा खाने को कुछ और नसीब नहीं होता है।
हम यहां देश के झारखंड राज्य की बात कर रहे हैं। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम के डुमरिया डिविजन हेडक्वार्टर से करीब 30किलोमीटर और जमशेदपुर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर यह जगह स्थित है। इस गांव का नाम 'दंपाबेड़ा' है। इस गांव से सटे करीब 4 हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर बसे हैं कुछ आदिम समुदाय के लोग।
सामान्य लोगों के बीच जंगल ब्लॉक के नाम से मशहूर इस गांव के लोग आज भी विकास से कोसों दूर है। शिक्षा तो दूर इन्हें खाने में भात के अलावा कुछ मालूम ही नहीं।
इस गांव में बाहरी लोग नहीं जाते हैं और ना ही ये लोग कहीं और जाते हैं। यहां सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है। भले ही दुनिया आज चांद पर कॉलोनी बनाने की बात कर रही है, लेकिन इनका दूर-दूर तक इन सबसे कोई वास्ता नहीं है।
सबसे ज्यादा दुख की बात तो यह है कि गांव में यदि कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ता है तो उसके इलाज के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। स्थिति इस कदर निराशाजनक है कि मरने से पहले ही बीमार पड़े व्यक्ति की कब्र खोद दिया जाता है।
यहां कुछ लोग गुजारा लकड़ी काटकर करते हैं। लकड़ी काटकर ये पहाड़ी से नीचे उतरकर हाट पर बेचने जाते है और काम खत्म होने के बाद फिर से ऊपर चढ़ जाते हैं। इनके घर मिट्टी के लेप से बनें होते हैं। माह में एक बार पहाड़ से उतरकर 12 किमी दूर बोमरो पैदल जाकर अनाज लाते हैं। अनाज खत्म होने पर कंद मूल को पकाकर खाते हैं।
Published on:
18 Jul 2018 04:21 pm
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