12 मार्च 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

दुनिया के लिए जनसंख्या से भी बड़ी है यह समस्या, भारत भी पार पाने में रहा है नाकाम

बढ़ती आबादी से कई तरह के सवाल खड़े होते हैं जैसे कि मरने के बाद लोगों को दफनाया कहां जाएगा।

3 min read
Google source verification

image

Arijita Sen

Oct 31, 2018

population

दुनिया के लिए जनसंख्या से भी बड़ी है यह समस्या, भारत भी पार पाने में रहा है नाकाम

नई दिल्ली। भारत में बढ़ती जनसंख्या एक बड़ी समस्या है, क्योंकि दुनिया भर की जनसंख्या में हम दूसरे नंबर पर आते हैं। यह एक ऐसी समस्या हैं जिस से आज दुनिया के तमाम मुल्क परेशान हैं। पर्यावरण के लिए हानिकारक होने के साथ यह आबादी जमीन पर भी अतिरिक्त बोझ डालती है। यही बोझ कभी-कभी किसी प्राकृतिक आपदा का कारण बन जाता है। बढ़ती आबादी से कई तरह के सवाल खड़े होते हैं जैसे सबको खाना कैसे मिलेगा? सबके लिए रोजगार कैसे उपलब्ध होगा। इसके अलावा सबसे बड़ी समस्या मरने के बाद लोगों को दफनाया कहां जाएगा।

कैफ़ी आजमी साहब ने क्या खूब कहा है कि इंसान की ख़्वाहिशों की कोई इंतेहा नहीं, दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद। अब वो दौर है कि मरने के बाद अपनी ख़्वाहिशों को इंसान समय रहते काबू कर ले तो बहुत अच्छा होगा। जी हाँ इस समय दुनिया के कई देश इंसानों के मरने के बाद उनकी लाशों के अंतिम संस्कार के लिए नए रास्ते ढूंढ रहे हैं। क्योंकि आबादी बढ़ने के साथ बाकी दूसरे कामों के लिए जमीन कम होने लगी है। इन कामों में अंतिम संस्कार भी एक प्रमुख है।

आमतौर पर अंतिम संस्कार तीन तरह से होता है जिसमें जलाना, दफनाना और पानी में बहाना है लेकिन जलाने और दफनाने के लिए जमीन की जरूरत होती है। जो लगातार कम होती जा रही है। लेकिन पानी में बहाने के लिए जमीन कर यह तीन तरीकें अलग-अलग धर्म के मानने वाले अपनी धार्मिक आस्थाओं के हिसाब से करते हैं ।

हालांकि समय के साथ अंतिम संस्कार के तरीकों में कुछ तब्दीली जरूर आई है जहां पहले लकड़ियों से लाश को जलाया जाता था वही अब कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक मशीनों से यह अंतिम क्रिया होती है। वहीं ईसाईयों ने भी इसमें समय के साथ कुछ तबदीली की है और यह अंतिम क्रिया जला कर करने लगे हैं। इसके अलावा पारसियों में लाश को ऊंचे टीले पर ले जाकर रखने की परंपरा है। जहां इन लाशों को जंगली जानवर या गिद्ध जैसे लाशों को खाने वाले पक्षी खा कर खत्म कर देते हैं। ऐसे में जमीन बचाने के लिए कुछ और अभिनव प्रयास करने होंगे।

आज हम इस बारे में बात इसलिए भी कर रहे हैं कि क्योंकि ग्रीस जैसे देश में अपनों को दफ़नाने के लिए लोगों के पास जगह ही नहीं बची है इसीलिए पुराने क़ब्रिस्तानों को खोदकर, उसमें से हड्डियां निकालकर, नए मुर्दों के लिए जगह बनाई जा रही है।

कई बार तो हड्डियों को एक बड़े से गड्ढ़े में डाल दिया जाता है, ऐसे में जो लोग कभी-कभी अपने पुरखों की क़ब्रों को देखने, उन्हें झाड़ने-पोंछने और दिया जलाने आते थे, उनको उनके पुरखों की कब्र नहीं मिलती है और हमेशा के लिए ये सिलसिला ख़त्म हो जाता है।

यूनान की राजधानी एथेंस में तो हालत और खराब हैं यहां पर दफ़न होने के लिए दो गज़ ज़मीन नहीं मिल रही है। यह सब सुनने में बड़ा अमानवीय लगता है, लेकिन सच तो यही है। ऐसे में अगर जल्द ही भारत जैसे देश में अंतिम संस्कार को लेकर कोई बड़ा फैसला नहीं होता है तो इसके परिणाम जरूर खतरनाक हो सकते हैं।