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Bangladesh Election: ओपिनियन पोल में इस पार्टी की प्रचंड लहर, क्या लौटेंगे ‘धुरंधर रहमान’ के दिन ? भारत सतर्क

Opinion Poll:बांग्लादेश चुनाव के ओपिनियन पोल में बीएनपी (BNP) को 70% समर्थन मिलने का अनुमान है, जबकि जमात पिछड़ रही है।

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भारत

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MI Zahir

Jan 06, 2026

Tarique Rahman Return

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के सर्वेसर्वा तारिक रहमान। ( फोटो: AI Gnerated)

Tarique Rahman: बांग्लादेश की राजनीति इस समय अपने सबसे महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़ी है। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद, अब सबकी नजरें 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनावों पर टिकी हैं। हालिया ओपिनियन पोल के नतीजे बताते हैं कि देश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की एकतरफा लहर चल रही है, जबकि कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी पिछड़ती नजर आ रही है। तारिक रहमान की वापसी और हिंदुओं पर बढ़ते हमलों के बीच भारत की नजरें ढाका के समीकरणों पर टिकी हुई हैं। 'एमिनेंस एसोसिएट्स फॉर सोशल डवलपमेंट' (EASD) के हालिया सर्वे के अनुसार, 70% जनता बीएनपी के पक्ष में खड़ी दिख रही है। इसके पीछे दो बड़े कारण माने जा रहे हैं:

भावनात्मक लगाव: पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन के बाद जनता की सहानुभूति पार्टी के साथ है।

तारिक रहमान का प्रभाव: करीब 17 साल बाद स्वदेश लौटे तारिक रहमान ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है। सर्वे में 71% महिलाओं ने भी बीएनपी को अपनी पहली पसंद बताया है।

जमात-ए-इस्लामी का गिरता ग्राफ और 'ISI' फैक्टर

पिछले महीने तक जहां बीएनपी और जमात के बीच कड़ी टक्कर मानी जा रही थी, वहीं अब जमात महज 19% पर सिमट गई है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि बांग्लादेश की जनता अब 'धर्म आधारित राजनीति' या 'शरिया कानून' के बजाय लोकतांत्रिक संविधान और शांति चाहती है। जमात पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के इशारों पर काम करने के आरोपों ने उसकी छवि को खासा नुकसान पहुँचाया है।

अवामी लीग के समर्थकों का नया ठिकाना

शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगने के बाद उसके वोट बैंक में बड़ी सेंध लगी है। सर्वे के मुताबिक, अवामी लीग के 60% समर्थक अब बीएनपी को वोट देने की तैयारी में हैं, जबकि 25% जमात की ओर रुख कर सकते हैं। यह बदलाव हिंसा से बचने और एक स्थिर विकल्प चुनने की चाहत को दर्शाता है।

भारत की रणनीति और सुरक्षा चिंताएं

भारत सरकार पड़ोसी देश में स्थिरता चाहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब बीएनपी के नेतृत्व के साथ औपचारिक संवाद बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खालिदा जिया के निधन पर भेजा गया शोक संदेश इसी कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, भारतीय खुफिया एजेंसियां सीमा पर हाई अलर्ट पर हैं, क्योंकि चुनाव से पहले कट्टरपंथी तत्वों द्वारा हिंसा भड़काने की आशंका बनी हुई है।

बांग्लादेशी स्थिरता और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दे रहे

बहरहाल, यह ओपिनियन पोल स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि बांग्लादेशी नागरिक अब कट्टरपंथ के बजाय स्थिरता और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। अवामी लीग की अनुपस्थिति ने बीएनपी के लिए रास्ता बिल्कुल साफ कर दिया है। हालांकि, तारिक रहमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती जमात और अन्य कट्टरपंथी ताकतों द्वारा पैदा की जाने वाली अराजकता से निपटना होगा। भारत के लिए भी यह 'वेट एंड वॉच' की स्थिति है, जहां वह एक ऐसी सरकार चाहेगा जो उग्रवाद को बढ़ावा न दे।

बांग्लादेश चुनाव: सुलगते सवाल

चुनाव आयोग की भूमिका: क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न हो पाएंगे ?

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: हालिया दिनों में हिंदुओं को निशाना बनाए जाने की घटनाओं के बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा।

तारिक रहमान की रैलियां: आने वाले हफ्तों में बीएनपी अपनी रैलियों के जरिए कितनी भीड़ जुटा पाती है।

सीमा सुरक्षा: भारत-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ (BSF) की मुस्तैदी और घुसपैठ की कोशिशों पर नजर।

युवा वर्ग निभा सकता है किंगमेकर की भूमिका

बहरहाल, इस पूरे चुनाव में 'तीसरी शक्ति' के रूप में उभरी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, हालांकि उसे पोल में मात्र 2.9% वोट ही मिले हैं। यह पार्टी उन छात्रों और युवाओं का प्रतिनिधित्व करती है जिन्होंने शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था। यदि भविष्य में बीएनपी और जमात के बीच टकराव बढ़ता है, तो यह युवा वर्ग किंगमेकर की भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा, जातीय पार्टी (1.4%) का घटता आधार भी बांग्लादेशी राजनीति में द्विध्रुवीय (Bipolar) मुकाबले की वापसी का संकेत दे रहा है।