
समुद्र के नीचे फाइबर केबल
जयपुर.
जुलाई 2019 में रूस की टॉप सीक्रेट पनडुब्बी लोशियारिक की बैट्री में विस्फोट होने से 14 रूसी नाविकों की मौत हो गई थी। उस वक्त पश्चिमी खुफिया एजेंसियों ने अनुमान लगाया कि पनडुब्बी का मिशन समुद्र के तल में बिछी केबल्स के जरिए जानकारी चोरी करना था, जो पूरी दुनिया में संचार की रीढ़ है। इन केबल्स के जरिए दुनिया का 95 फीसदी संचार जुड़ा है और इसके जरिए हर दिन दस ट्रिलियन डॉलर का लेन-देन होता है। हाल के वर्षों में केबल गलियारों के साथ रूसी नौसेना की गतिविधि में वृद्धि हुई है। 2015 में एक अंग्रेजी अखबार ने बताया कि कैसे अमरीकी जासूसी उपग्रहों, जहाजों और विमानों ने रूसी जहाजों पर नजर रखी, क्योंकि उसने भी (रूस) अमरीका के पूर्वी तट पर एक केबल का पीछा किया था।
केबल का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1860 से 1870 के बीच ब्रिटेन ने अंडर-सी केबल टेलीग्राफ नेटवर्क का विस्तार पूर्व में भूमध्य सागर और हिंद महासागर तक किया था। 1870 में चार केबल कंपनियों ने मिलकर मुंबई को लंदन से जोड़ा। 1872 में इन चारों कंपनियों ने मिलकर ईस्टर्न टेलीग्राफ कंपनी बनाई। इस कंपनी ने 1876 में ऑस्ट्रेलिया, मुंबई, सिंगापुर और चीन को जोड़ा।
जब 17 घंटे 40 मिनट में पहुंचा विक्टोरिया का संदेश
पहली अंतर्महाद्वीपीय टेलीग्राफ केबल 1858 में न्यूफाउंडलैंड से आयरलैंड तक अटलांटिक में डाला गया था। इससे पहला टेलीग्राफ संदेश रानी विक्टोरिया ने अमरीकी राष्ट्रपति जेम्स बुकानन को भेजा था। 509 अक्षरों के इस संदेश को पहुंचने में 17 घंटे और 40 मिनट का समय लगा था। 1858 और 1911 के बीच ब्रिटेन को विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य के चलते इसकी दरकार थी और ब्रितानी उद्यमियों ने इसका खर्च उठाया था।
Updated on:
10 Nov 2019 06:16 pm
Published on:
10 Nov 2019 06:09 pm
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