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भारत समेत दुनियाभर के 120 देश ब्रिटेन में करेंगे बैठक, जानिए किन मुद्दों पर होगी चर्चा

वर्ल्ड मीटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, चीन नंबर 1 पर है, जबकि भारत दूसरे नंबर पर। हालांकि, चीन का पिछले एक साल का नुकसान भारत से करीब ढाई गुने से भी ज्यादा यानी 238 अरब डॉलर का है। विशेषज्ञ इस नुकसान को जलवायु परिवर्तन से जोड़ कर देख रहे हैं।  

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Ashutosh Pathak

Oct 28, 2021

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नई दिल्ली।

प्राकृतिक आपदाओं जिसमें बाढ़, सूखा, बेमौसम बारिश और तूफान की वजह से भारत को बीते एक साल में करीब 87 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है।

वर्ल्ड मीटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, चीन नंबर 1 पर है, जबकि भारत दूसरे नंबर पर। हालांकि, चीन का पिछले एक साल का नुकसान भारत से करीब ढाई गुने से भी ज्यादा यानी 238 अरब डॉलर का है। विशेषज्ञ इस नुकसान को जलवायु परिवर्तन से जोड़ कर देख रहे हैं।

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इन सब कारणों को देखते हुए भारत समेत दुनियाभर से लगभग 120 देश ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में जुट रहे हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन और उससे होने वाले खतरे से निपटने पर एकसाथ कदम उठाया जा सके।

दिल्ली, उत्तराखंड से लेकर केरल तक, गुजरात से लेकर पश्चिम बंगाल और असम तक के लोगों ने बदलते तापमान की वजह से होने वाले इन बदलावों को नजदीक से महसूस किया है।

इन बदलावों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ग्लासगो दौरा अहम हो जाता है। यहां दुनिया के तमाम बड़े देश दुनिया के बदलते तापमान को लेकर चर्चा करने वाले हैं। ग्लासगो में COP26 सम्मेलन 31 अक्टूबर से होने वाला है। 13 दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन को COP सम्मेलन कहा जाता है, जिसका मतलब - कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज है।

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इस बार इस सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति जो बिडेन आने वाले हैं। भारत की तरफ से पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव तो रहेंगे ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें हिस्सा लेने वाले हैं। इस वजह से भारत के संदर्भ में ये सम्मेलन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

ग्लासगो का एजेंडा वैसे तो बहुत बड़ा है, लेकिन उनमें से सबसे अहम और महत्वपूर्ण है पेरिस समझौते के नियमों को अंतिम रूप देना। साल 2015 में क्लाइमेट चेंज को लेकर पेरिस समझौता हुआ था। इसका मकसद कार्बन गैसों का उत्सर्जन कम कर दुनियाभर में बढ़ रहे तापमान को रोकना था ताकि ये 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा ना बढ़ने पाए। इसके बाद देशों ने स्वेच्छा से अपने लिए लक्ष्य तय किए थे।

संयुक्त राष्ट्र के ताजा अनुमान के मुताबिक, वर्तमान में अलग-अलग देशों ने जो लक्ष्य तय किए हैं, उससे दुनिया का तापमान इस सदी के अंत तक 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ेगा। इसलिए जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से निपटना और ज्यादा जरूरी हो जाता है।

ग्लासगो में इसी बात पर चर्चा होगी कि इस बार 2 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर वादा करने से बात नहीं बनेगी। दुनिया के सभी देशों को मिलकर इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं बढ़ने देने का संकल्प करना होगा।

इसके लिए जरूरी है कि सभी देश अपने नेट-जीरो डेडलाइन बताएं। ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन और वातावरण से ग्रीनहाउस गैस कम करने के बीच के संतुलन को नेट-जीरो इमिशन कहते हैं। इसका मतलब ये है कि हर देश को एक वर्ष, डेडलाइन के तौर पर देना है, जब उस देश का कुल कार्बन-उत्सर्जन शून्य हो जाए।

चीन, दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है। चीन पहले ही घोषणा कर चुका है कि वह 2060 तक कार्बन न्यूट्रल हो जाएगा। चीन ने यह भी कहा है कि उसका उत्सर्जन 2030 से पहले अपने चरम पर पहुंच जाएगा।

दूसरे सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश अमेरिका ने नेट-जीरो तक पहुंचने के लिए 2050 तक का लक्ष्य रखा है। अमरीका का कहना है कि वह 2035 तक अपने पावर सेक्टर को डी-कार्बनाइज़ कर देगा। लेकिन भारत ने अभी तक इसके लिए अपनी डेडलाइन नहीं बताई है।