
दुनिया में जल संकट (फोटो- प्रतिकात्मक AI)
दुनिया अब 'वाटर स्ट्रेस' (जल तनाव) से आगे बढ़कर 'ग्लोबल वाटर बैंक्रेप्सी' (वैश्विक जल दिवालियापन) के युग में प्रवेश कर गई है। जापान की राजधानी में स्थित संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (यूएनवी) के इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इंसान मीठे पानी के स्रोतों का इस कदर दोहन कर रहा है कि अब उनका उबरना नामुमकिन सा हो गया है।
संयुक्त राष्ट्र पहले 'जल संकट' जैसे शब्दों का उपयोग करता था, जिसमें सुधार की गुंजाइश होती थी। लेकिन 'बैंक्रेप्सी' शब्द का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया गया है कि हमने अपनी जमापूंजी (भूजल और प्राकृतिक जलाशय) को पूरी तरह लुटा दिया है। झीलों पर निर्भर एक-चौथाई आबादी उन जलाशयों से पानी ले रही है, जिनका आधा पानी 1990 के बाद गायब हो चुका है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के कई शहर 'डे जीरो' की ओर बढ़ रहे हैं, जहां म्युनिसिपल वाटर सिस्टम पूरी तरह ठप हो सकता है। ईरान की राजधानी तेहरान में पानी की इतनी कमी है कि राजधानी को कहीं और स्थानांतरित करने या शहर को खाली करने की नौबत आ सकती है।
पानी की कमी के कारण लैटिन अमरीका, दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका में बड़े पैमाने पर पलायन होने की संभावना है। वहीं, नीति आयोग और विभिन्न शोधों के अनुसार भारत में बेंगलूरु, चेन्नई और दिल्ली जैसे महानगर 'डे जीरो' के सबसे करीब हैं, जहां अनियंत्रित शहरीकरण और भूजल के अत्यधिक दोहन ने जल प्रणालियों को पतन की कगार पर पहुंचा दिया है।
खेती और बढ़ता तापमान पौधों की प्यास बढ़ा रहे हैं, जिससे सिंचाई के लिए और अधिक पानी की जरूरत पड़ रही है। साथ ही, प्रदूषण और कचरे ने बचे हुए पानी को भी उपयोग के लायक नहीं छोड़ा है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि अभी वैश्विक निगरानी ढांचा तैयार नहीं किया गया, तो अच्छी बारिश के दिनों में भी हम पानी के लिए संघर्ष करते रहेंगे। लगातार भूजल दोहन, जंगलों की कटाई, भूमि क्षरण और प्रदूषण ने जल स्रोतों को स्थायी नुकसान पहुंचाया है। जलवायु परिवर्तन ने इस आग में घी डालने का काम किया है।
Published on:
22 Jan 2026 09:15 am
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