
भारतीय नौसेना। ( फोटो: ANI)
Maritime: पश्चिम एशिया में चल रहे भीषण ईरान युद्ध के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक बेहद साहसिक और बड़ा फैसला लिया है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की किल्लत और बढ़ी कीमतों के बीच, भारत अब दुनिया के सबसे खतरनाक और तनावग्रस्त समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के रास्ते अपने तेल टैंकर भेजने की पूरी तैयारी कर चुका है। फरवरी के आखिर में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद यह पहला मौका होगा, जब भारत इस बंद पड़े रास्ते से कच्चे तेल की नई खेप देश में लाने की कोशिश करेगा। सूत्रों के मुताबिक, इस मास्टर प्लान का पूरा खाका तैयार है और सरकार से अंतिम हरी झंडी मिलते ही भारतीय जहाज रवाना हो जाएंगे।
गौरतलब है कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 फीसदी (एक-तिहाई हिस्सा) इसी संकरे समुद्री मार्ग यानी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। युद्ध छिड़ने के बाद से इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही लगभग शून्य हो गई है, जिससे भारत जैसे बड़े आयातक देशों के सामने ऊर्जा संकट गहरा गया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल और आधी से अधिक गैस बाहर से आयात करता है। ऐसे में शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने फारस की खाड़ी में दोबारा अपने जहाजों को उतारने की पूरी तैयारी कर ली है। जैसे ही भारतीय नौसेना से सुरक्षा मंजूरी और तेल रिफाइनरियों से कॉमर्शियल ऑर्डर मिलेंगे, ये मिशन शुरू हो जाएगा। हालांकि, अमेरिकी नाकेबंदी और ईरानी पाबंदियों के बीच सुरक्षित रास्ता मिलना सबसे महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
इस बड़े कदम के पीछे भारत की मजबूत कूटनीति भी काम कर रही है। हाल ही में नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। ईरान ने आश्वासन दिया है कि वह भारत जैसे मित्र देशों के व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने की अपनी 'ऐतिहासिक जिम्मेदारी' निभाएगा। दूसरी तरफ, सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए भारतीय नौसेना ने इस समुद्री इलाके में अपने युद्धपोतों (Warships) की संख्या को दोगुना कर दिया है। हवा से निगरानी बढ़ा दी गई है, और भारतीय नौसेना के कमांडो इन तेल टैंकरों को सुरक्षा कवच प्रदान करेंगे। इसके अलावा, युद्ध क्षेत्र में जहाजों के जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने एक विशेष 'मरीन इंश्योरेंस योजना' भी शुरू की है, ताकि कंपनियों को किसी भी नुकसान की भरपाई मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह फैसला बेहद साहसिक और कूटनीतिक रूप से संतुलित है। रक्षा और विदेश मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत ने पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन में शामिल न होकर अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' बनाए रखी है, जिससे ईरान या अमेरिका द्वारा भारतीय जहाजों पर सीधे हमले की आशंका बेहद कम है। हालांकि, रिफाइनरी कंपनियों के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जब तक पहला टैंकर सुरक्षित पार नहीं हो जाता, तब तक जोखिम की घंटी बजती रहेगी।
इस मिशन की अगली कड़ी में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि भारतीय नौसेना और रक्षा मंत्रालय कब जहाजों के पहले बेड़े को रवाना होने की अंतिम अनुमति देते हैं। इसके साथ ही, भारत-अमेरिका और भारत-ईरान के बीच बैक-चैनल डिप्लोमेसी (परदे के पीछे की बातचीत) पर नजर रहेगी, क्योंकि अमेरिका ने इस रूट पर कड़ा प्रतिबंध लगा रखा है। तेल की पहली खेप सुरक्षित आने के बाद ही अन्य निजी शिपिंग कंपनियां भी इस रास्ते पर आगे बढ़ने का हौसला जुटा पाएंगी।
इस पूरी घटना का एक आर्थिक पहलू देश के आम नागरिकों से भी जुड़ा है। पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत के राजकोष और विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ा है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से ईंधन की बचत करने और विदेशी मुद्रा के समझदारी से इस्तेमाल की अपील की है। अगर भारत का यह मिशन सफल रहता है, तो घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है और महंगाई से राहत मिल सकती है।
Published on:
20 May 2026 08:10 pm
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