
शेख हसीना और खालिदा जिया (फोटो-IANS)
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की अध्यक्ष खालिदा जिया का लंबी बीमारी के बाद आज निधन हो गया। वह 80 साल की थीं। उनकी मौत की खबर के साथ ही बांग्लादेश की चार दशकों से चली आ रही सियासी दुश्मनी के एक महत्वपूर्ण युग का अंत भी हो गया। यह युग था बैटल ऑफ बेगम्स का।
खालिदा जिया और हसीना का राजनीतिक इतिहास रक्तरंजित रहा है। शेख हसीना जहां आवामी लीग की संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं। जिनकी साल 1975 में सैन्यकर्मियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। उस हत्याकांड में मुजीब परिवार के कई लोग मारे गए। शेख हसीना और उनकी बहन शेख रेहाना इसलिए बच गई थीं, क्योंकि वह उस समय जर्मनी में थी।
वहीं, खालिदा जिया का राजनीतिक सफर उनके पति जियाउर रहमान से जुड़ा है। जियाउर रहमान मुक्ति युद्ध के नायक थे, जिन्होंने 1971 में स्वतंत्रता की घोषणा की थी। उन्होंने उन्होंने 27 मार्च 1971 को चटगांव (चिटागॉन्ग) के कालुरघाट रेडियो स्टेशन (स्वाधीन बांग्ला बेतार केंद्र) से बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा प्रसारित की।
जिया उर रहमान ने कहा था, 'यह स्वाधीन बांग्ला बेतार केंद्र है। मैं, मेजर जियाउर रहमान, बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की ओर से घोषणा करता हूं कि स्वतंत्र बांग्लादेश जनगणराज्य स्थापित हो चुका है। मैं सभी बंगालियों से पश्चिम पाकिस्तानी सेना के हमले के खिलाफ उठने का आह्वान करता हूं।'
वे 1977 से 1981 तक राष्ट्रपति रहे, लेकिन 1981 में एक असफल तख्तापलट में उनकी हत्या कर दी गई। पति की मौत के बाद गृहणी खालिदा ने राजनीति में प्रवेश किया और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी।
कहा जाता है कि 1975 में बंगबंधु यानि की शेख मुजीब उर रहमान की हत्या में जियाउर रहमान की भूमिका संदिग्ध थी। उन पर यह आरोप लंबे समय तक चस्पा रहा। इधर, पिता की हत्या के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण लिया और लगभग 6 साल तक निर्वासन में रहीं। इस दौरान उन्होंने कई बार वतन वापसी की कोशिश की, लेकिन बेगम खालिदा के पति और बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति और सैन्य शासक जिया उर रहमान की सरकार ने उनके आने का विरोध किया। मगर 17 मई 1981 को वे ढाका लौटीं। इसके ठीक 13 दिन बाद 30 मई 1981 को एक सैन्य तख्तापलट के प्रयास में जिया उर रहमान की हत्या कर दी गई थी।
एक समय ऐसा भी आया जब शेख हसीना और खालिदा जिया एक साथ आई थीं। सैन्य शासक हुसैन मुहम्मद इरशाद के खिलाफ दोनों बेगम्स ने साथ मिलकर आंदोलन चलाया। हड़तालें की, संघर्ष करते हुए लाठियां खाईं। वैश्विक दवाब के आगे हुसैन मुहम्मद ने घुटने टेक दिए और 1990 में चुनाव हुआ। 1991 के चुनाव में खालिदा ने शेख हसीना को चुनावी पटखनी दी और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। वे 1991-96 और 2001-06 तक सत्ता में रहीं।
हालांकि, अगले आम चुनाव में सत्ता विरोधी लहर के कारण BNP को करारी हार का सामना करना पड़ा और शेख हसीना चुनाव जीतकर सत्ता में पहुंचीं। पांच साल बाद हसीना भी चुनाव हार गईं। 2001 से 2006 तक फिर खालिदा ने देश की बागडोर संभाली। 2006 के बाद 2024 तक लगातार 18 साल तक हसीना ने बांग्लादेश को चलाया।
सत्ता के आदान प्रदान के दौरान दोनों बेगमों के बीच संघर्ष भी हुए। हसीना के शासन में खालिदा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उन्हें 2018 में जेल हुई और बाद में घर में ही नजरबंद कर दिया गया। उधर, जब खालिदा जिया पीएम थी, उस दौरान शेख हसीना पर जानलेवा हमला भी हुआ था।
Updated on:
30 Dec 2025 12:40 pm
Published on:
30 Dec 2025 12:34 pm
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