
एआई (Representational Photo)
एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI - Artificial Intelligence) के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही एआई मॉडल्स को और ज़्यादा बुद्धिमान और सटीक बनाने की अंधी दौड़ में टेक कंपनियों ने एक ऐसा रास्ता अपना लिया है जिसने दुनिया भर के इतिहासकारों, लेखकों और शोधकर्ताओं को स्तब्ध कर दिया है। टेक दिग्गजों ने एआई डेटा ट्रेनिंग के लिए दुर्लभ और दुर्लभतम किताबों को भारी मात्रा में खरीदना, उनकी जिल्द काटकर उन्हें स्कैन करना और फिर नष्ट करना शुरू कर दिया है।
अमेरिका के एक मीडिया आउटलेट '404 मीडिया' की एक हाल ही में खोजी गई रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई है। आशंका जताई जा रही है कि एआई कंपनियाँ दुनिया की हर छपी किताब को स्कैन करने के लिए हर आईएसबीएन कोड को ट्रैक कर रही हैं।
एआई के ज्ञान को और बढ़ाने के लिए किताबों की बेतुकी थोक खरीददारी होती है और बिना किसी एक विषय के सैकड़ों दुर्लभ और पुरानी किताबों के बेतुके और गुमनाम ऑर्डर दिए जाते हैं। इसके बाद इन किताबों को क्रूर स्कैनिंग प्रक्रिया से गुज़रना होता है जिसके दौरान किताबों के पन्नों को तेज़ी से स्कैन करने के लिए किताबों की बाइंडिंग यानी जिल्द काटकर अलग कर दी जाती है। फिर इन किताबों से डेटा एक्सट्रैक्शन किया जाता है। एआई 'मॉडल कोलैप्स' की समस्या से बचने के लिए किताबों से इंसान रचित शुद्ध डेटा निकाला जाता है। स्कैनिंग पूरी होने के बाद पन्नों और किताबों की जिल्द फिर से बांधकर रखने के बजाय किताबों को नष्ट कर दिया जाता है।
एआई कंपनियाँ अब तक मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए इंटरनेट पर मौजूद इंसानों के लिखे ब्लॉग्स, सोशल मीडिया पोस्ट्स आदि डेटा का इस्तेमाल करती थीं, जो अब खत्म होने की कगार पर है। वहीं जब एआई को उसी के जनरेट किए गए डेटा से ट्रेन किया जाता है, तो 'मॉडल कोलैप्स' की समस्या आती है यानी एआई का आउटपुट घटिया होने लगता है। गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इंसानों का लिखा ओरिजिनल डेटा ही एकमात्र ज़रिया है। इसलिए कंपनियाँ अब उन ऑफलाइन और दुर्लभ किताबों की ओर भाग रही हैं जो इंटरनेट पर मौजूद नहीं हैं।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं, बल्कि इंसानी इतिहास और संस्कृति पर हमला है। 'दुर्लभ किताब' का मतलब सिर्फ प्रथम संस्करण जैसी चर्चित पुस्तकें नहीं हैं, बल्कि इसमें विषय-विशेष पुस्तकें भी हैं, जिनकी बहुत कम प्रतियाँ छपी थीं। पुरानी लोकल गाइड्स, दुर्लभ मैनुअल भी इनमें शामिल हैं। एआई कंपनियों को इन पुस्तकों के ऐतिहासिक या बौद्धिक मूल्य से कोई सरोकार नहीं है। वो सिर्फ डेटा और शब्दों के संग्रह के लिए इन्हें नष्ट कर रही हैं।
Updated on:
25 Aug 2026 05:44 am
Published on:
25 Aug 2026 05:44 am
