एलजीबीटी यानी लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर लोगों तक विभिन्न मुद्दों को पहुंचाना, उनसे बात करना तो दूर मेरे अपने आसपास के लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया कि भला ये भी कोई रिसर्च टॉपिक है। ये तो पागलपन है, दूसरी तरफ कॉलेज में दोस्त मिलते तो पूछते, और एलजीबीटी क्या हाल है? कहीं पर जाते हुए खाते-पीते हुए गे अक्षर पर ज्यादा जोर देना, जैसे वहां चलोगे... गे-गे-गे... क्या खाओगे... गे-गे-गे... क्या पीओगे... गे-गे... अरे कुछ बोलोगे... गे-गे... कहीं तुम एलजीबीटी तो नहीं हो गए...'। इतना ही नहीं लोग यहां तक कहने लगे जिसे सार्वजनिक रूप से भारत में कहना स्वीकार्य नहीं है। आम लोगों के विचार इस तरह से हो सकते हैं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल रहा। यहां तक कि घर के लोगों का भी ये कहना था कि ये लोग समाज की गंदगी हैं।