राजधानी में कुछ प्रॉ-मिलिट्री समूह इस बदलाव को 'सिविलियन लोकतंत्र की वापसी' बता रहे हैं, लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ नाम का है। उनके मुताबिक, असल में सत्ता अब भी सेना के ही हाथों में बनी हुई है और यह कदम सैन्य शासन को और मजबूत करने की दिशा में देखा जा रहा है।