
बाबरी मस्जिद अयोध्या
डॉ. भानु प्रताप सिंह
छह दिसम्बर, 1992। पूरे 25 साल हो गए हैं, लेकिन स्मृतियां आज भी ताजा हैं। मैं आगरा के प्रसिद्ध अखबार की ओर से रिपोर्टर के रूप में कवरेज के लिए अयोध्या में था। मैंने देखा कि अयोध्या में लाखों कारसेवक थे। अय़ोध्या की तंग गलियों में चारों और दिखाई दे रहे थे सिर्फ कारसेवक। तय किय गया था कि कारसेवक सरयू की माटी और जल एक गड्ढे में डालेंगे और आगे चले जाएंगे। यह बात कारसेवकों को ज्ञात हुई तो मानो उनका खून ही खौल उठा। उनका कहना था कि हम यहां कारसेवा करने के लिए आए हैं, तमाशा देखने के लिए नहीं। ये सूचनाएं कारसेवा की व्यवस्था में लगे विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन बृज प्रांत संगठन मंत्री चम्पत राय तक पहुंच रही थीं। उनका कहना था कि हमारे कारसेवक अनुशासित हैं, सब ठीक हो जाएगा।
सुरक्षा घेरा टूटा, ढांचा ढहाया
विवादित ढांचे को बचाने के लिए लोहे की रॉड से बेरीकेडिंग बनाई गई थी। उससे पहले सुरक्षा कर्मचारी थी। विवादित ढांचे के करीब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे, जो हाफ पैंट और सफेद कमीज में थे। इन स्वयंसेवकों को अय़ोध्या में लगातार प्रशिक्षण दिया जा रहा था कि कोई विवादित ढांचे की ओर बढ़ता है तो क्या करना है। आखिरकार, छह दिसम्बर, 1992 को नियत समय पर कारसेवा शुरू हुई। उधर, एक मंच बना हुआ था, जिस पर लालकृष्ण आडवाणी , आरएसएस के प्रमुख होवि शेषाद्रि, अशोक सिंघल, उमा भारती , मुरली मनोहर जोशी और अनेक साधु-संत विराजमान थे। वे स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे। राम मंदिर बनाने की बात हो रही थी। राम विलास वेदांती के भाषण से कारसेवक ढांचा ढहाने के लिए उत्तेजित हो रहे थे। कोई भी स्वयंसेवक सरयू के रेत से कारसेवा के लिए तैयार नहीं था। सुरक्षा के इंतजाम ध्वस्त होने लगे। बेरीकेडिंग तोड़ दी गई। अंतिम सुरक्षा घेरा संघ के स्वयंसेवकों का था। उन्होंने कारसेवकों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन संख्या बल के आग वे हार गए। कारसेवकों ने स्वयंसेवकों को उठा-उठाकर फेंक दिया। लोहे की रॉड लेकर स्वयंसेवक विवादित ढांचे पर चढ़ गए और गुम्बद पर प्रहार करने लगे। उमा भारती को भेजा गया कि स्वयंसेवकों को समझाएं, लेकिन उनके साथ अभद्रता कर दी गई। कारसेवकों का गुस्सा देख लालकृष्ण आडवाणी मंच से चले गए।
विनय कटियार की बात
विवादित ढांचे का एक गुम्बद ध्वस्त होने लगा तो मैं अयोध्या स्थित अपने कार्यालय की ओर भागा। हमारा कार्यालय एक आश्रम के सामने थे। मैंने वहां देखा कि विनय कटियार खड़े हुए थे और स्वयंसेवकों से पूछ रहे थे कि क्या हो रहा है? अयोध्या के लोग हाथों में कुदाल, फावड़ा, लोहे की छड़ें लेकर विवादित ढांचे की ओर जा रहे थे। वे चाहते थे कि कारसेवक ढांचे को जल्दी ढहा दें ताकि समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाए।
कार्यालय के बाहर सरदार
मैं अपने कार्यालय में गया। तब मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे। सम्पर्क का एकमात्र साधन डॉट फोन और फैक्स ही था। मैंने देखा कि कार्यालय के बाहर दो सरदार टहल रहे थे। मैंने जैसे ही टेलीफोन की ओर हाथ बढ़ाया, तो सरदार ने हाथ पकड़ लिया। कहा कि बाबरी मस्जिद गिर जाए, तब फोन करना। मैंने कहा कि मुझे खबर देनी है, दिन में ही अखबार निकलना है। वे नहीं माने। फिर मैंने विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस के कई नेताओं के नाम बताए, तब जाकर उन्होंने फोन करने दिया। हमारी टीम के अन्य साथी फँस गए थे। कारसेवकों ने पत्रकारों के साथ अभद्रता शुरू कर दी थी। कैमरे छीन लिए थे। इस प्रकरण की जांच हुई, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
पीएसी ने नहीं रोका
सात दिसम्बर, 1992 को मैं अय़ोध्या के अस्पताल में पहुंचा। वहां घायल स्वयंसेवक इलाज करा रहे थे, लेकिन शांत नहीं थे। बार-बार कह रहे थे कि हमें जाने दो, बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिटाना है। कारसेवकों को आशंका थी कि विवादित ढांचा गिराया जाएगा, तो सेना आ सकती है। इसकी रोकथाम के इंतजाम भी कर लिए गए थे। सड़कों पर गड्ढे कर दिए गए थे। टायर जलाए गए थे। यूं तो अय़ोध्या में पीएसी तैनात थी, लेकिन उसने किसी भी कारसेवक को नहीं रोका। इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से कारसेवकों को सहयोग दिया जा रहा था। इस बात को कारसेवक खुलकर कह रहे थे। अयोध्या में छह दिसम्बर के बाद करफ्य़ू लगा दिया गया था, लेकिन इसका अनुपालन नहीं हो सका था। गलियों में लाखों स्वयंसेवक थे। तीन दिन बाद अयोध्या कारसेवकों से खाली कराई जा सकी। तब तक बहुत कुछ बदल चुका था। भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बर्खास्त कर दी गई थीं। देशभर में दंगे शुरू हो गए थे। अय़ोध्या प्रकरण अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। सबको इन्तजार है कि सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला करता है। कोई कुछ भी कहे, लेकिन सही बात तो यह है कि विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद से कट्टर हिन्दू और कट्टर मुस्लिमों के बीच खाई है, जो 25 साल बाद भी भर नहीं पाई है।
खाने की समस्या
छह दिसम्बर को अय़ोध्या में सबकुछ बंद था। भोजन की समस्या थी। तब हमें एक साधु परिवार ने भोजन कराया। एक बार भोजन कारसेवकों से आग्रहपूर्वक मंगाया गया। हमारा होटल तो फैजाबाद में था, लेकिन पूरे दिन अयोध्या में ही रहते थे। होटल में तो सिर्फ सोने के लिए जाते थे।
ट्रेन में लग रही थी शाखा
जब मैं आगरा से ट्रेन द्वारा अय़ोध्या रवाना हुआ था अजीब दृश्य था। हर सीट पर कारसेवक था। सुबह और शाम के समय ट्रेनों में ही आरएसएस की शाखा लगाई जा रही थी। प्रार्थना हो रही थी। सामूहिक गीत हो रहे थे। लग रहा था ट्रेन को आरएसएस की शाखा के लिए बनाया गया था।
मेरे जीवित होने का प्रमाण
मेरी पत्नी गर्भवती थी और नर्सिंग होम आगरा में भर्ती थी। मेरे जीवित होने का प्रमाण था कि अखबार में नाम छपना। एक दिन नाम नहीं छपा तो घरवाले चिन्तित हो गए। डॉक्टर प्रभा मल्होत्रा और डॉ. नरेन्द्र मल्होत्रा ने अखबार के कार्यालय से टेलीफोन नम्बर लेकर किसी तरह घर वालों से बात कराई। जब मैं अय़ोध्या से लौटकर आय़ा तो अखबार के लिए किसी हीरो से कम नहीं था। मुझे स्वेटर खरीदने के लिए नकद पुरस्कार भी दिया गया।
Updated on:
06 Dec 2017 12:44 pm
Published on:
06 Dec 2017 09:31 am
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