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गुरुद्वारा गुरु का ताल में कीजिए भोरा साहिबजी के दर्शन, जानिए क्या हुआ था यहां

यह वह पवित्र स्थान है, जहां सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर को नौ दिन तक बंदी बनाकर रखा गया था। यहां अखंड ज्योति भी है।

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आगरा

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Dhirendra yadav

Oct 09, 2017

Gurudwara guru ka taal

Gurudwara guru ka taal

आगरा। आगरा-दिल्ली मार्ग पर सिकंदरा के निकट है गुरुद्वारा दुख निवारण गुरु का ताल। इसे गुरुद्वारा गुरु का ताल के नाम जाना जाता है। गुरुद्वारा में चौबीसो घंटे लंगर चलता है। यहां सिखों के गुरु तेग बहादुर के चरण पड़े थे। यहीं से उन्हें औरंगजेब ने गिरफ्तार किया था। खास बात यह है कि गुरुद्वारा गुरु का ताल में ही भोरा साहिब जी हैं। यह एक गुफा है, जहां चौबीसो घंटे गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ चलता रहता है। इसके दर्शन मात्र से कष्ट दूर हो जाते हैं। आइए, आज आपको भोरा साहिब जी के दर्शन करवाते हैं।

यहां नौ दिन रखा गया था गुरु तेग बहादुर को
आप जब गुरुद्वार गुरु का ताल में सीढ़ियों से प्रवेश करते हैं तो उससे पहले ही आपके बाएं हाथ पर है भोरा साबिह जी। यही वह स्थान है, जहां गुरु तेग बहादुर को नौ दिन तक बंदी बनाकर रखा गया था। सबसे अंत की कोठरी में गुरु तेग बहादुर थे और अन्य कक्ष प्रहरियों के लिए बनाए गए थे। यह बात सन 1675 की है। इस बात को 342 साल हो गए हैं। जहां गुरु तेग बहादुर को बंदी बनाकर रखा गया था, वही स्थान आज भोरा साहिबजी कहलाता है।

अखंड ज्योति
इसमें प्रवेश करते ही दाएं हाथ पर अखंड ज्योति है। इसकी बड़ी मान्यता है। जो लोग भोरा साहिब जी में मत्था टेकने आते हैं, वे अखंड ज्योति पर भी मत्था टेकते हैं। कहा जाता है कि यहा कोई शक्ति है, जो लोगों की मनोकामना पूरी करती है। पत्रिका टीम को मौके पर हाथरस का एक परिवार मिला। उसने बताया कि यहां हमारी श्रद्धा है। पिताजी बीमार हो गए थे, उनके लिए दुआ की तो वे ठीक हो गए। तब से यहां आते रहते हैं। वे सिख नहीं हैं, लेकिन किसी ने बताया कि गुरुद्वारे में जाकर दुआ करो तो लाभ होगा। मौके पर भोरा साहिबजी के द्वार पर बैठे निहंग ने बताया कि यहां पर गुरु तेग बहादुर को औरंगजेब ने नौ दिन तक बंदी बनाकर रखा था। गुरु तेग बहादुर ने हिन्दुओं की रक्षा के लिए बलिदान दिया था।

हर मनोकामना होती पूरी
गुरुद्वारा गुरु का ताल के मीडिया प्रभारी गुरुनाम सिंह और समन्वयक बंटी ग्रोवर ने बताया कि भोरा साहिब जी पवित्रतम स्थल है। यहां आकर मत्था टेकने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। इसके साथ ही यहां आकर गुरुओं के बलिदान की अमर गाथा से परिचित होते हैं। भोरा साबिह जी का प्राचीन स्वरूप यथावत है। हां, भवन की सुरक्षा के लिए रंग रोगन कराया जाता है।

1675 में आए थे गुरु तेग बहादुर
मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। उसने कश्मीरी ब्राह्मणों से कहा कि मुसलमान बनो, नहीं को कत्ल कर दिए जाएंगे। कश्मीरी ब्राह्मणों ने समय मांगा। अरमनाथ गुफा जाकर भगवान शिव से प्रार्थना की। वहां हुई आकाशवाणी के आधार पर कश्मीरी ब्राह्मण 25 मई, 1675 को आनंदपुर साहिब गुरु तेग बहादुर की शरण में पहुंचे। गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी ब्राह्मणों के मुखिया कृपाराम दत्त से कहा कि काशी के ब्राह्मणों को साथ लेकर दिल्ली जाएं। औरंगजेब से कहें कि हिन्दुओं के पीर सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर मुसलमान बन जाएंगे तो भारतवर्ष स्वयं ही मुस्लिम हो जाएगा। इस पर औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर की गिरफ्तारी का आदेश दिया। उसने गुरु पर 500 मोहरों का इनाम भी घोषित कर दिया। आगरा के ककरैठा (गुरुद्वारा के पीछे) गांव का रहने वाले चरवाहे हसन अली खां ने सोचा कि अगर 500 मोहरें मिल जाएं तो उसकी गरीबी दूर हो जाएगी। कहते हैं कि चरवाहे की इच्छा पूरी करने के लिए गुरु तेग बहादुर अक्टूबर 1675 में आगरा पहुंचे। बादशाही बाग में डेरा डाल दिया। यहीं पर हसन अली खां बकरियां चरा रहा था। गुरु ने उससे पानी मांगा, लेकिन वह बकरी का दूध ले आया। गुरु ने फिर पानी मांगा तो कहा कि पानी खारा है। गुरु ने कहा कि पानी लेकर आओ, पानी हजारा (मीठा) है। हसन अली खां पानी लाया तो यह मीठा हो गया। यही कुआं गुरुद्वारा की पूर्व दिशा में है। गुरु को हसन अली खां की इच्छा पूरी करनी थी। उन्होंने हसन अली खां को अपनी हीरे की अंगूठी और दुशाला देकर कहा कि कुछ खाने को लेकर आओ। कीमती सामान देकर दुकानदार को शक हुआ कि चोरी करके लाया है। उसने कोतवाल को सूचना दे दी। इसके बाद पता चला कि ये तो हिन्दुओं के पीर हैं। औरंगबेज ने इन पर 500 मोहरों का इनाम घोष
ित किया है। गुरु तेग बहादुर को गिरफ्तार कर लिया गया। नौ दिन तक भोरा साहिबजी में बंदी बनाकर रखा। फिर दिल्ली ले जाया गया। गुरु ने मुसलमान बनना स्वीकार नहीं किया। जहां आज गुरुद्वारा शीशगंज (चांदनी चौक, दिल्ली) है, वहीं पर गुरु ने बलिदान दे दिया। वे हिन्द की चादर बन गए।