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विशेष: पश्चिम यूपी की चुनावी राजनीति में करवट

अजित का वर्ष 2019 में चुनाव नहीं लड़ने का एलान, मथुरा छोड़ बागपत जा सकते हैं जयंत।-मथुरा से रालोद के न लड़ने की स्थिति में गठबंधन में सपा बसपा से ज्यादा कांग्रेस का होगा दावा -भाजपा भी चुनावी पैक्ट के लिए कर सकती है पेशकश, राजनीतिक गलियारों में अटकलें

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आगरा

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Amit Sharma

Jul 26, 2018

Ajit RLD

विशेष: पश्चिम यूपी की चुनावी राजनीति में करवट

मथुरा। रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित सिंह द्वारा बागपत से वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव न लड़ने का जो एलान किया है, उससे पश्चिमी यूपी खासकर मथुरा की चुनावी राजनीति पर असर पड़ने जा रहा है।
अब मथुरा लोकसभा सीट से वतर्मान सांसद हेमा मालिनी के सामने जयंत के लड़ने पर संशय पैदा हो गया है। हेमा मालिनी स्वयं मथुरा से ही अगला चुनाव लड़ने की इच्छा हाईकमान के समक्ष व्यक्त कर चुकी हैं। अब ये संभव है कि वर्ष 2019 में जयंत चौधरी अपने पिता की विरासत सम्हालने बागपत चले जाएं।

रालोद की चुनाव समीक्षा बैठक में भाग लेने बागपत पहुंचे अजित सिंह ने चुनाव न लड़ने की घोषणा कर पश्चिमी यूपी में खासकर रालोद की राजनीति में हलचल पैदा कर दी। वरिष्ठ पत्रिकार और पश्चिमी यूपी के जानकार चंद्र प्रताप सिकरवार का मानना है सीधे तौर पर इससे मथुरा की राजनीति पर असर पड़ेगा। यहां कयास प्रारंभ हो गए हैं। अजित सिंह ने कहा कि अब मैं 80 साल का हो गया हूं। वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लडूंगा। मीडिया से बातचीत में अजित सिंह ने महागठबंधन को समय की जरूरत भी बताया। कहा कि महागठबंधन के तहत 2019 का चुनाव लड़ना हर दल की मजबूरी है। अगर अगला लोकसभा चुनाव कोई दल अकेला लड़ता है तो वह समाप्त हो जाएगा।
पूर्व प्रधानंमंत्री व किसान नेता स्व. चरण सिंह के निधन के बाद अजित सिंह अमेरिका से इंजीनियर की नौकरी छोड़ वर्ष 85 में राजनीति में आए थे। इसके बाद वह पश्चिमी यूपी की राजनीति में छाये और अपने पिता की विरासत को सम्हाला था। सबसे पहले वर्ष 1986 में पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए। वर्ष 1989 में अजित बागपत से पहली बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसके बाद वर्ष 1991 और वर्ष 1996 में भी बागपत से चुने गए। हालांकि, वर्ष 1998 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर फिर से राष्ट्रीय लोकदल का गठन किया। वर्ष 1999, 2004 और 2009 में भी लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। पीवी नरसिंह राव सरकार में खाद्य मंत्री बने। वर्ष 2009 में रालोद-भाजपा पैक्ट के चलते फिर से जीते लेकिन अटल विहारी वाजपेयी की सरकार फिर से न बन पाने पर यूपीए में सम्मिलित हो गए और मनमोहन सरकार में कृषि मंत्री बने।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के सामने रालोद का खाता भी नहीं खुला। उन्हें बागपत से बीजेपी के टिकट पर पहली बार चुनाव लड़े मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह आईपीएस ने हराया। सत्यपाल सिंह आज केंद्र में मंत्री हैं। वह नरसिंह राव सरकार में खाद्य मंत्री कार्यकाल में अजित सिंह के ओएसडी हुआ करते थे।

मथुरा छोड़ कर जयंत बागपत से लङेंगे?
पश्चिम यूपी में पकड़ रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल को मोदी लहर में वर्ष 2014 में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था। अजित सिंह बागपत से और बेटा पूर्व सांसद जयंत चौधरी मथुरा से हार गए थे। मथुरा से भाजपा की हेमा मालिनी ने साढे तीन लाख वोटों से जयंत को हराया था। अब दो कयास लग रहे हैं। पहला जयंत के अगला चुनाव मथुरा के बजाए बागपत से लड़ने का लगाया जा रहा है। वह अपनी पत्नी चारू को भी बागपत या मथुरा से उतार सकते हैं।

रालोद के न लड़ने पर मथुरा में होगा कांग्रेस का दावा
जयंत बागपत गये तो मथुरा से गठबंधन में सपा, बसपा से ज्यादा दावा कांग्रेस का बनता है। कु.मानवेंद्र मथुरा से तीन बार सांसद रहे हैं। अब वह किसी दल में नहीं हैं। यह भी संभव है कि मथुरा सीट रालोद के कोटे में आयी तो जयंत चौधरी यहां से रालोद के किसी भारी भरकम नेता को हेमा के सामने उतार सकते हैं।
एक चर्चा यह भी कि पश्चिमी यूपी में भाजपा स्वयं रालोद से दोस्ती का हाथ बढ़ा सकती है और वर्ष 2009 की तरह मिल कर चुनाव लड़ने की पेशकश कर सकती है। यह तभी संभव है जब गठबंधन में रालोद को सम्मानजनक सीट न मिल पायें। यद्यपि आज अजित सिंह गठबंधन में ही रह कर चुनाव लड़ने की बात कह चुक हैं।