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Birthday Special जानिए राधास्वामी मत के आचार्य Dadaji maharaj और उनके पूर्वजों के बारे में

-स्वामी जी महाराज ने 1861 में बसंत पंचमी के दिन की थी राधास्वामी मत की स्थापना -हजूर महाराज, लालाजी महाराज, कुंवर जी महाराज क्रमशः दूसरे, तीसरे और चतुर्थ आचार्य -27 जुलाई, 1930 को जन्म प्रो. अगम प्रसाद माथुर 1959 से संभाल रहे हैं कमान

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आगरा

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Dhirendra yadav

Jul 27, 2019

dadaji maharaj

dadaji maharaj

हमारा यह देश महापुरुषों की भूमि रहा है। हमारी संस्कृति और सभ्यता का वैशिष्ट्य ही यह है कि उसने महापुरुषों, संतों एवं साधुओं के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व से प्राणरस ग्रहण करके अपने स्वरूप को उपलब्ध किया है। जब-जब हम अन्धकार से घिरे हैं तथा हमें समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, तब-तब इन आलोक स्तंभों ने हमें मार्ग दिखाया है। राधास्वामी मत radhasoami के वर्तमान आचार्य प्रो. अगम प्रसाद माथुर (Agam Prasad mathura दादाजी महाराज (Dadaji maharaj) ऐसी अलौकिक प्रतिभा का पुंजीभूत स्वरूप हैं जिन्होंने न केवल एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में, बल्कि एक समर्थ सामाजिक एवं राष्ट्रीय विचारक के रूप में नयी और पुरानी पीढ़ी को जीवन को सार्थक बनाने की दिशा दी है। सागर तट पर खड़े होकर हम दूर से आती जिस उत्ताल तरंग को देखते हैं, हमें प्रतीत होता है कि यह सर्वाधिक प्रबल है किन्तु कुछ ही क्षणों में उससे भी विशाल तरंग हमारे समक्ष होती है और यह क्रम निरन्तर गतिमान रहता है। प्रो. माथुर का जीवन, सागर की उत्ताल तरंगों की भाँति निरन्तर और निस्सीम है। उसे शब्दों में बांधना मुट्ठियों में आकाश को बन्दी बनाने जैसा है। हाँ, हम उसकी एक झलक अवश्य पा सकते हैं, जिसका प्रयास हमने किया है।

धार्मिक सुधारकों के वंशज

प्रो. अगम प्रसाद माथुर (Agam Prasad mathur) सुविख्यात अध्यात्मवेत्ताओं, परम संतों, एवं सामाजिक-धार्मिक सुधारकों के वंशज हैं। उनके पूर्वजों ने महान राधास्वामी (Radhasoami) मत की स्थापना की, जिसके वे वर्तमान में आचार्य एवं अधिष्ठाता हैं और जिनके भारत और विदेशों में करोड़ों सतसंगी और अनुगामी हैं। उनके सतसंगी (अनुयायी) उनके प्रति अगाध प्रेम, सम्मान, अपार श्रद्धा और कृतज्ञता रखते हैं, जिसके प्रतीक रूप में उन्होंने लगभग 5000 पृष्ठों एवं चार खण्डों तथा उपखण्डों में अभिनन्दन ग्रन्थ श्रृंखला प्रकाशित करवाई। दादाजी महाराज का जन्म 27 जुलाई, 1930 को हुआ। 27 जुलाई, 2019 को वे 89 वर्ष के हो गए हैं। आइए जानते हैं दादाजी महाराज और उनके पूर्वजों के बारे में।

प्रथम आचार्यः परम पुरुष पूरन धनी स्वामी जी महाराज

स्वामी जी महाराज (Swamiji maharaj) का जन्म 25 अगस्त, 1818 को जन्माष्टमी के दिन पन्नी गली, आगरा में खत्री परिवार में हुआ था। पारिवारिक नाम था सेठ शिवदयाल सिंह। छह साल की आयु में ही योगाभ्यास शुरू कर दिया था। हिन्दी, उर्दू, फारसी, गुरुमुखी का ज्ञान था। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य हजूर महाराज के आग्रह पर 1861 में बसंत पंचमी के दिन सतसंग की स्थापना की। पहला सतसंग मौज प्रकाश की धर्मशाला, माईथान, आगरा में हुआ। पन्नी गली स्थित आवास पर 17 साल तक सत्संग की अध्यक्षता की। 15 जून, 1878 को देह त्याग दी। उनकी समाध राधास्वामी बाग (स्वामी बाग), आगरा में है। उनके दर्शन के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं।

द्वितीय आचार्यः परम पुरुष पूरन धनी हजूर महाराज

राधास्वामी मत के दूसरे आचार्य राय सालिगराम बहादुर हजूर महाराज (Hazur mahraraj) का जन्म 14 मार्च, 1829 को पीपल मंडी, आगरा में कायस्थ परिवार में हुआ था। आगरा कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की। 1847 में हजूर महाराज ने पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के पोस्ट मास्टर जनरल के कार्यालय में कार्य शुरू किया। 1861 में वे पोस्ट मास्टर जनरल बने। इस उच्च पद पर पहुंचने वाले पहले भारतीय थे। आम जनता के लिए एक पैसे का पोस्टकार्ड उन्होंने शुरू कराया, जो आज भी लोकप्रिय है। 1871 में रायबहादुर की पदवी से सम्मानित किया गया। 1858 में स्वामी जी महाराज से भेंट हुई। लगातार 20 साल तक उन्होंने गुरु की सेवा की। 1878 में निज धाम सिधारते समय स्वामी जी महाराज ने हजूर महाराज को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। हजूर महाराज ने 1885 में पीपल मंडी में सात चौक वाले भव्य मकान की स्थापना की। यही स्थान आज हजूरी भवन के नाम से जाना जाता है। यहां तब से आज तक राधास्वामी की गूंज हो रही है। हजूर महाराज की समाध इसी परिसर में है। 1898 में हजूर महाराज निजधाम सिधार गए। इसके बाद उनके अस्थिकलश यहीं स्थापित किए गए।

तृतीय आचार्यः लालाजी महाराज

हजूर महाराज के बाद हजूरी भवन में सत्संग का संचालन उनके पुत्र राज अजुध्या प्रसाद ने 1898 में संभाला। सत्संगी उन्हें लालाजी महाराज (Lalaji maharaj) कहते हैं। उनका जन्म 29 दिसम्बर, 1866 को हुआ था। कहा जाता है कि पूर्व जन्म में वे अयोध्या के संत थे। अय़ोध्या के संत उनके दर्शन के लिए आए थे। 26 नवम्बर, 1926 में उन्होंने देह त्याग दी। उनकी समाध हजूर महाराज की समाध के निकट है।

चतुर्थ आचार्यः कुंवर जी महाराज

लालाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र कुंवर जी महाराज का जन्म 20 सितम्बर, 1885 को हजूरी भवन में हुआ था। पारिवारिक नाम गुरु प्रसाद था। उन्हें घुड़सवारी, शतरंज और टेनिस का शौक था। उनके दो पुत्र हुए- प्रेम प्रसाद और आनंद प्रसाद। कुंवर जी महाराज ने सत्संग की कमान 1929 से 1959 तक संभाली। 27 फरवरी, 1959 को वे भजन के दौरान ही अंतर्ध्यान हो गए।

वर्तमान आचार्यः दादाजी महाराज

राधास्वामी मत के चतुर्थ आचार्य कुंवर जी महाराज के पुत्र आनंद प्रसाद के चार पुत्र और चार पुत्रियां हुईं। ज्येष्ठ पुत्र के रूप में प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर (दादाजी महाराज Dadaji maharaj) का जन्म 27 फरवरी, 1930 को रात्रि 8.45 बजे हुआ। उनका जन्म हजूरी भवन के उसी कक्ष में हुआ, जहां उनके बाबा कुवंर जी महाराज और पिता आनंद प्रसाद का जन्म हुआ था। नाम रखा गया अगम। दूसरे पुत्र शब्द प्रसाद माथुर का जन्म 1932 में, तीसरे पुत्र स्वामी प्रसाद माथुर का जन्म 1935 में और चौथे पुत्र सरन प्रसाद का जन्म 1938 में हुआ। 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ तो अगम के आग्रह पर हजूरी भवन में तिरंगा फहराया गया और मिष्ठान्न वितरण हुआ। बालक के रूप में प्रो. माथुर ने हुजूरी भवन को क्रांतिकारियों के छिपने का स्थल बना दिया था। 1952 से 1982 तक आगरा कॉलेज में सेवाएं दीं। आगरा विश्वविद्यालय के लगातार दो बार कुलपति रहे- 1982 से 1985 तक तथा 1988 ई. से 1991 तक। इससे पहले 1976 से 1979 तक बीपी जौहरी कुलपति रहे, लेकिन इस दौरान अप्रत्यक्ष रूप से प्रो. अगम प्रसाद माथुर ही कुलपति थे। इस बात को स्वयं बीपी जौहरी ने स्वीकारा है। 1959 से प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर राधास्वामी सत्संग की कमान संभाल रहे हैं।

अभिनन्दन ग्रन्थ

अभिनन्दन ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में विश्व के उच्च पदस्थ व्यक्तियों के अनेक बधाई संदेश तथा समाज के विभिन्न वर्गों एवं सतसंगियों के आलेख संकलित हैं। द्वितीय खण्ड में प्रो. माथुर के चुने हुए भाषणों तथा अति विद्वतापूर्ण और मौलिक आलेखों का संग्रह है। इस खण्ड के तीन भाग हैं। नाम ‘पैटल्स ऑफ लव’ पुस्तक अंग्रेजी में है। दूसरे भाग में प्रो. माथुर द्वारा रचित राधास्वामी सतसंग, हजूरी भवन की मान्यता के अनुसार राधास्वामी मत के आचार्यों और पूर्वजों की जीवन झांकियाँ हैं तथा संक्षेप में राधास्वामी मत के मुख्य सिद्धान्त और दर्शन का वर्णन भी किया गया है। दोनों ही पुस्तकों की शिक्षा जगत एवं सामान्य पाठकों द्वारा अत्यन्त सराहना की गई है। तृतीय खण्ड में विद्वान इतिहासज्ञों एवं विभिन्न विषयों, यथा दर्शनशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाज विज्ञान, साहित्य एवं धर्म इत्यादि के देश-विदेश के प्रसिद्ध विशेषज्ञों के शोध लेख सम्मिलित हैं। चतुर्थ खण्ड में प्रो. माथुर की बाल्यकाल से लेकर सन् 1995 ई. तक चित्रों में प्रदर्शित जीवन गाथा है।

1980 में कराया ‘यादगार-ए-सुलह-ए-कुल’

27 जुलाई सन् 1930 ई. को जन्मे प्रो. माथुर ने अपना शैक्षिक जीवन आगरा कालेज (आगरा विश्वविद्यालय) में इतिहास प्रवक्ता के रूप में सन् 1952 ई. में प्रारम्भ किया और वे सन् 1964 ई. में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष हो गये। अपने शिक्षण कार्य में गुरुतर विशिष्टता और आकर्षण समेटे प्रो. माथुर शिक्षकों, छात्रों और शिक्षा जगत के सुधी विद्वानों के मध्य प्रतिष्ठापित हो गये। इसी मध्य वर्ष सन् 1980 ई. में उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये अनूठा योगदान देते हुए आगरा किला और फतेहपुर सीकरी स्मारकों में ‘यादगार-ए-सुलह-ए-कुल’ नामक कार्यक्रम का आयोजन कराया और पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। उनकी इन्हीं शैक्षिक एवं प्रशासनिक विशिष्टताओं के कारण उ.प्र. सरकार ने उन्हें शैक्षिक जीवन के शीर्ष स्थान पर आगरा विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में दो पूर्ण कार्यकालों (सन् 1982 ई. से सन् 1985 ई. तक तथा सन् 1988 ई. से सन् 1991 ई. तक) के लिये नियुक्त किया। कुलपति के रूप में उन्होंने विश्वविद्यालय के शैक्षिक और अनुशासनात्मक रूप को अभूतपूर्व उत्कृष्टता पर पहुँचा दिया और चौबीस व्यवसायपरक पाठ्यक्रम प्रारम्भ करके विश्वविद्यालय को आवासीय विश्वविद्यालय में परिवर्तित कर दिया। इस अवधि में प्रो. माथुर ने अपनी मौलिक योजनाओं, विचारों और परिवर्तनों से शिक्षा जगत में अविस्मरणीय योगदान दिया।

इतिहासकार, लेखक, कवि, भक्ति योग का अभूतपूर्व ज्ञान

प्रो. माथुर सर्वमान्य एवं सुविख्यात विद्वान एवं इतिहासकार हैं। वे मध्यकालीन और आधुनिककालीन भारतीय इतिहास तथा यूरोपीय और ब्रिटिश इतिहास के विशेषज्ञ के सम्मानित अध्याय के रूप में उभरे हैं। वे गम्भीर शोधार्थी एवं सजग लेखक हैं। वे साहित्य सृजन की विविधोन्मुखी प्रतिभा के धनी हैं, जिन्होंने सार्वजनिक सभाओं, शैक्षिक अधिवेशनों, संगोष्ठियों तथा गोष्ठियों में अगणित भाषण दिये हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की है तथा उनका सम्पादन किया है। प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने विभिन्न ज्वलन्त एवं सामयिक विषयों पर उनके मौलिक एवं सारगर्भित विचारों को समय-समय पर प्रमुखता से प्रकाशित एवं प्रसारित किया है। उन्होंने 300 से भी अधिक आलेख, इतिहास और संस्कृति, अर्थशास्त्र, विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी, जन कल्याण, दर्शन, समाजशास्त्र, राजनीति, साहित्य, कला, संगीत, समाज के निर्बल वर्गों के उत्थान, नवीन शिक्षा नीति, राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय एकता और सुदृढ़ता, अन्तर्राष्ट्रीयता, स्थापत्य कला, सामाजिक अन्याय, महिला स्थिति, पर्यावरण प्रदूषण, जनसंख्या विस्फोट, आतंकवाद, खादी एवं स्वदेशी का महत्व, न्यायिक सक्रियता, धर्म और अध्यात्म, धर्मनिरपेक्षता, प्रेम, शान्ति, भ्रातृत्व, नैतिकता, आदि अनेक विषयों पर लिखे हैं जो मौलिक शोध पर आधारित हैं और स्तरीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। आपको मध्यकालीन भक्ति साधना तथा अलौकिक भक्ति योग का अभूतपूर्व ज्ञान है।

प्रस्तुतिः डॉ. अमी आधार निडर