रमजान-ए मुबारक यानी रहमतों वाला महीना, जानिए रोजे नहीं रखते तो क्या होता है...

अगर किसी बीमारी की वजह से रोजा नहीं रख पाएं तो खुल्लम-खुल्ला खाने से परहेज करें

By: धीरेंद्र यादव

Published: 24 May 2018, 07:44 AM IST

आगरा। इस्लाम मजहब के पांच रूकूनों में से एक रूकून ”रोजा“ भी है- अल्लाह पाक ने हर मुसलमान पर एक माह के रोजे फर्ज़ किये है- यह माह ”रमजान-ए मुबारक का इस महीने के तराबियो की जानिब पूरा कुरान-ए-पाक सुनने की भी हिदायत की है । यह माह सब्र का माह है इस सब्र का बदला-जन्नते फिरदोश में अपना मुकाम बनाना। इस माह में हर मोमिन की रोजी में तरक्की कर दी जाती है। इस माह में अगर कोई शख्स रोजेदार को इफ़्तार कराता है तो वह उसकी मुगफिरत का जरिया बन जाता है। यही नहीं इफ्तार कराने वाले को भी रोजे का ही शबाब मिलता है।

तीन हिस्सों में बांटा गया ये माह
इस माह को तीन हिस्सों में भी बांट कर देखा जाता है पहले दस रोज का हिस्सा रहमतों वाला कहलाता है। दूसरा हिस्सा मगफिरत का होता है और आखरी दस दिनों का हिस्सा दोजस से महफूज रखने वाला होता है। जन्नत के दरवाजे हर रोजेदार मोमिन के लिये इस मुबारिक महीने में खोल दिये जाते हैं। एक रिवायत के जरिये बताया गया है कि नबी-ए-करीम ने फरमाया है कि रमजान की आखिरी शब में अल्लाह-ए-तआला आपकी उम्मत के रोजेदारों की मगफिरत फरमा देते हैं। अर्ज किया है या रसूल क्या वह शब ”लैलतुल कद्र“ होती है? फरमाया नहीं मगर बात यह है कि मजदूर की मजदूरी काम खत्म होने पर दे दी जाती है। हजरत अनसबिन मालिक रज़िअल्लाह-ओ-ताला फरमाते है कि नबी-ए करीम ने फरमाया कि देखा यह माह-ए-रमजान मुबारक हमारे पास आया है- इसमें एक रात जो हजार महीनों की रातों से बढ़कर है। जो मोमिन इससे महरूम रहेगा वह हर किस्म के खैर से महरूम रहा। रोजा और कुरान दोनों-खुदा के बन्दों की शफाअत करते हैं। कहा गया है कि कयामत के रोज-खुद रोजा कहेगा कि ऐ परवर दिगार मैंने दिन भर इसे खाने-पीने और शहवात से रोके रखा था। लिहाजा इसके बारे में मेरी शफाअत कुबूल फरमाए इसी तरह कुरान-ए-पाक फरमायेगा कि ऐ-परवर दिगार मैंने इस को रात में सोने से महरूस रखा-लिहाजा इसके हक में मेरी शफाअत कुबूल फरमाऐं, लेकिन अफसोस-आज भी कुछ मोमिन इन सिफारिषों से महरूम रहते दिखाई देते हैं।

रोजा रखने वालों को इनाम
रोजा रखने वालों को इनाम अल्लाह-ताला खुद ही अपने हाथों से देगा-ऐसा एक रिवायत में फरमाया गया है क्यों कि रोजेदार पूरे दिन हर चीज से महरूम रहकर सिर्फ खुदा की ही इबादत में लगे होने के बाद मेहनत से भी मुंह नहीं मोड़ पाता। मोमिन की इस इवादत को खुद अल्लाह ताला देखता है। क्योंकि मोमिन अपनी शहवत-और अपने खाने-पीने को सिर्फ मेरे लिये (खुदा के लिये ही) छोड़ता है। उल्लामा-ए-दीन फरमाते हैं कि रोजेदार की दो अहम खुषियां हैं। एक खुशी उसको इफ़तार के वक्त रूहानी होगी। हर रोजेदार के लिये एक दुआ भी होती है, जो रद्द नहीं होती और जरूर कुबूल होती है। हमारे हुजूर इफ़्तार के वक़्त यह दुआ मांगा करते थे। यह उलमा भी फरमाते हैं, हदीस है कि नबी-ए-करीम ने एक बार मैम्बर पर चढ़ते वक़्त तीनों सीढ़ियों पर कदम रखते वक़्त तीन बार ”आमीन“ फरमाया-एक सहाबा ने दरयाफ़्त फरमाया कि या रसूल अल्ला आज आप ने ऐसा अमल फरमाया है जो ऐसा कभी नहीं किया हुजूर ने इरषाद फरमाया कि जब मैंने पहले दर्जे के मैम्बर पर कदम रखा तो जिब्राईल अमीन ने कहा कि खाक आलूद हो उस शख्स की जो वालिदेन (माँ-बाप) की खिदमत न करें और जन्नत से महरूम रहे, मैंने कहा ”अमीन“ और फिर जब मैंने दूसरी सीढ़ी पर कदम रखा तो उन्होंने फरमाया कि खाक आलूद हो वह शख्स जिस के सामने आप का नाम लियो जाये और वह दुरूद शरीफ न पढ़े मैंने कहा ”आमीन“ फिर जब मैंने तीसरी सीढ़ी पर कदम रखा तो जिब्राईल अमीन ने फरमाया कि जो शख्स रमजान-ए-मुबारक माह के रोजे रखने से महरूम रहे और खुदा की रहमतों का फायदा न उठाऐं वह खाक आलूद हो-मैंने कहा ”आमीन“ रमजान शरीफ वह महीना है जिसमें कुरान-ए-पाक नाजिल हुआ, इस नेमत का शुक्रिया अता करने के लिये रोजे रखना फर्ज हुआ इस माह की शबे-कद्र की रात में जो शख्स पूरी रात जागकर नमाज अता करते हैं तो उस शख्स के साथ ही फ़रिष्ते भी पूरीरात नमाज पढ़ते हैं। वह शख्स उस रात खुदा से जो दुआ करता है। वह जरूर कुबूल होती।

अलग से मिलता शबाब
कई उल्माओं ने मेरे से फरमाया कि रमजान माह में जो शख्स फर्ज़ नमाजों के अलावा नवाफिल भी पढ़ेगा तो खुदा उनका अलग से शबाब अता करेगा। इस माह की एक रात हजार महीनों से बेहतर है। हर मोमिन को पूरे माह के रोजे निहायत ही जौक व शौक और एहतमाम के साथ रखने चाहिये, अगर किसी बीमारी की वजह से रोजा नहीं रख पाएं तो खुल्लम-खुल्ला खाने से परहेज करें और इस तरह रहिये कि सामने वाला भी आप को रोजेदार ही समझें। अगर आप कुरान पढ़े हुये हैं तो इस माह ज्यादा से ज्यादा कुरान-ए-पाक की तिलावत करें अगर कुरान नहीं पढ़े है, तो जो पढ़ रहा है। अगर अल्लाह तौफीक दे तो तहज्जुद की नमाज भी पढ़े। इस माह में सक़दा और खैरात भी ज्यादा से ज्यादा करें बेवाओ-यतीमों-बेसहारा लोगों की खबर लेते रहें। कहीं वह इफ़तार या सेहरी से महरूम तो नहीं हैं। शबेकद्र-रमजान ने आखिरी अषरे की पांच रातों में से एक रात होती है इसी शब-कद्र की रात को कुरान नाजिल हुआ इसलिये पांचों रातों में जागकर ज्यादा से जयादा नवाफिक पढ़ें। इसी आखरी अषरे में ”एतकाफ“ में भी बैठना चाहिये इस रमजान नवाफिल माह में हर इन्सान के साथ नर्मी से पेश आऐं- झूठ और बेईमानी से परहेज रखें। माँ-बाप और बुजुर्गो की खिदमत करें। इस माह में खुदा शैतान को कैद कर लेता है और अपने फरिश्तों को हुकुम देता है कि हर रोजेदार के दुआ पर आमीन कहो। सदका-जक़ात-फित्र जरूर दिल से ईद की नमाज से पहले अदा करें, जिससे हर मशकीन भी ईद की खुशी में आप के साथ शामिल हो सके।

प्रस्तुति
डॉ. सिराज कुरैशी
कबीर पुरुस्कार से सम्मानित
17/14 सदर भट्टी, आगरा

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धीरेंद्र यादव
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