
आगरा। करीब ढाई दशक बाद आगरा मेयर की सीट अनारक्षित हो गई है। पहले से ही मेयर के चुनाव के लिए सबसे ज्यादा टिकटार्थी भारतीय जनता पार्टी में हैं, सीट सामान्य वर्ग के कोटे में जाते ही भाजपा में रस्साकसी तेज हो गई है, क्योंकि भाजपा में सबसे लंबी लाइन सामान्य वर्ग के टिकटार्थियों की है। हालांकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में भी दावेदारों की कमी नहीं है। बहुजन समाज पार्टी ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोेले हैं।
28 साल बाद अनारक्षित हुई सीट
आगरा मेयर की सीट 28 साल बाद आनारक्षित हुई है। 1989 में रमेशकांत लवानिया ने मेयर का पहला चुनाव लड़ा और जीता, तब भी आगरा मेयर की सीट अनारक्षित थी। इसके बाद वर्ष 1995 में महिला अनुसूचित कोटे की सीट से बेबीरानी मौर्य ने जीत दर्ज की। 2001 में सीट अनुसूचित जाति कोटे में गई और किशोरी लाल माहौर को मेयर की सीट पर बैठने के मौका मिला। एक बार फिर साल 2006 में आगरा मेयर की सीट अनुसूचित जाति महिला कोटे में गई औऱ इस बार अंजुला सिंह माहौर ने जीत दर्ज की। बीते 2012 चुनाव में अनुसूचित जाति कोटे से इंद्रजीत आर्य को आगरा का मेयर बनने का मौका मिला। अब 28 साल बाद आगरा का मेयर सामान्य वर्ग से चुना जाएगा।
भाजपा में लंबी है दावेदारों की लाइन
मेयर के चुनाव के लिए दावेदारों की सबसे लंबी लाइन भाजपा में है। प्रमुख दावेदारों में मीडिया प्रभारी ब्रज क्षेत्र सुरेंद्र गुप्ता एडवोकेट, ब्रज क्षेत्र उपाध्यक्ष और निकाय चुनाव प्रभारी प्रमोद गुप्ता, पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष और वर्तमान सदस्यता प्रमुख पुरुषोत्तम खंडेलवाल, उत्तर प्रदेश भाजपा के सह कोषाध्याक्ष नवीन जैन को माना जा रहा है।
कैसे होगा प्रत्याशी तय
वैसे तो भाजपा निकाय चुनाव को लेकर ज्यादातर तैयारी पूरी कर चुकी है। आरक्षण तय होने के बाद अब प्रत्याशी चयन करना बाकी है। ज्यादातर दावेदार अपने बायो़ाटा दे चुके हैं। प्रत्याशी चयन के लिए भाजपा का पैनल निर्णय लेगा। इस पैनल में जिला अध्यक्ष, महानगर अध्यक्ष, प्रभारी, संगठन मंत्री, क्षेत्रीय अध्यक्ष, जिला के प्रभारी, कुछ एक महत्वपूर्ण जनप्रतिनिधि शामिल होंगे।
Updated on:
13 Oct 2017 01:23 pm
Published on:
13 Oct 2017 10:13 am
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