
dadaji maharaj
आगरा। राधास्वामी मत के अधिष्ठाता प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर (दादाजी महाराज) का कहना है कि मत के अनुयायियों के लिए नैतिक आचरण संहिता जारी की गई है। इसके तहत 15 अनमोल वचन हैं। सच्चे सतसंगी को पूर्ण विश्वास और निष्ठा के साथ इनका अनुपालन करना चाहिए।
1.राधास्वामी मत सच्चा धर्म और राधास्वामी सच्चे कुल मालिक का नाम है।
2.वक्त के संत सतगुरु कुलमालिक के अवतार हैं। पूर्ण दीनता और प्रेम से भक्तजनों को उनकी सेवा तन मन धन एवं सुरत (आत्मा) से करनी चाहिए। उनके सतसंग में पूर्ण आस्था और निष्ठा से जाना चाहिए।
3. सतगुरु द्वारा जिस नाम का रहस्योद्घाटन किया गया है, वही राधास्वामी नाम अलौकिक धुन है। राधास्वामी ध्वन्यात्मक नाम अथवा रचना के सर्वोच्च धाम में प्रतिध्वनित अलौकिक धुन है। वह सभी, जो नीचे के लोक में प्रकट हुए, उसके अधीन है। राधास्वामी सर्वव्यापाक दिव्य धुन है, जिसमें रचना के विभिन्न लोगों को समन्वित करने का सामर्थ्य है। राधास्वामी ही सतशब्द है या सच्चा पवित्र नाम है।
5.एक सच्चे सतसंगी को पूर्णतः अपने सतगुरु की मौज पर निर्भर रहना चाहिए। कुछ भी अपने जीवन में घटित हो, उसे कभी दोषारोपण नहीं करना चाहिए। यही समझना चाहिए कि वह सबके कल्याण के लिए घटित हुआ है।
6. मांस भक्षण एवं मादक दृव्यों का सेवन पूर्णतः निषिद्ध है। गरिष्ठ भोजन तथा अधिक भोजन नहीं करना गुणकारी है। निद्रा की अवधि भी शनैः-शनैः कम करते हुए छह घंटे तक होनी चाहिए।
7.सांसारिक लोगों से संपर्क अथवा भौतिक पदार्थों के प्रति अनुरक्ति कम करना तथा उतना ही कम से कम करना उचित है, जिसके बिना कार्य न चल सके। सांसारिक विचारों द्वारा मस्तिष्क को शासित नहीं होने देना चाहिए। मन एवं इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहिए। निजी एवं व्यावसायिक कर्तव्यों की पूर्ति शांति एवं मानसिक संतुलन के साथ करना चाहिए।
8. अहंकार एवं प्रतिष्ठा की भावना- जाति, धर्म स्तर तथा व्यक्तिगत विशेषताओं के आधार पर कभी नहीं उपजने देना चाहिए। प्रेम एवं दीनता ही सच्चे गुण अथवा वास्तविक आभूषण हैं, जिन्हें अपनाना चाहिए।
9. ईष्र्या, शत्रुता एवं क्रोध नहीं करना चाहिए। समय को व्यर्थ बातचीत और निरर्थक कार्यों में नहीं गंवाना चाहिए। सहिष्णुता एवं क्षमा की प्रवृत्ति धारण करनी चाहिए।
10. प्रेम, ममता एवं भ्रातृत्व की भावना परस्पर सतसंगियों में होनी चाहिए। भक्ति के आदर्शों के परिपालन की सत्य कामना पोषित होनी चाहिए।
11.आध्यात्मिक कार्यों के संपादन में जिन क्रियाकलापों, रीतियों, पर्वों और उत्सवों से बाधा पड़े, उनकी ओर कभी ध्यान नहीं देना चाहिए। सांसारिक लाभ के भय से मत के नियमों के पालन से मन विमुख नहीं करना चाहिए।
12.उदारता एवं दानशीलता का पालन करना चाहिए। आय का एक निश्चित भाग परमार्थ कार्यों में व्यय करना चाहिए।
13. संसार में दूसरों से ऐसा ही व्यवहार अपेक्षित है, जैसा कोई व्यक्ति दूसरों से पाना चाहता है। यदि कोई व्यक्ति दूसरों को लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं है, तो उसे हानि भी नहीं पहुंचानी चाहिए। संसार में नाम, यश प्राप्ति आदि के लक्ष्य में कुछ करना उचित नहीं है।
14.सतगुरु के अतिरिक्त किसी से भी अपना आध्यात्मिक अनुभूति, सुरत शब्द योग के अभ्यास के आंतरिक रहस्य तथा मालिक की दया, मेहर की आंतरिक अनुभूति (प्रत्यक्ष परिचय) किसी मूल्य पर भी नहीं बताना चाहिए।
15.सतसंगी के सभी क्रियाकलापों- लौकिक या अलौकिक- में सत्य ही पथ दिग्दर्शक होना चाहिए। जिसमें सत्य का रंचमात्र भी अभाव हो, उसे कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए।
कौन हैं दादाजी महाराज
राधास्वामी मत का आदि केन्द्र हजूरी भवन, पीपलमंडी, आगरा में हैं। यहीं पर राधास्वामी मत के द्वित? गुरु ??ु परमपुरुष पूरनधनी हजूर महाराज रहे। सतसंग किया। राधास्वामी मत को देश और दुनिया में फैलाया। हजूर महाराज की प्रार्थना पर ही परमपुरुष पूरनधनी स्वामीजी महाराज ने 1861 में वसंत पंचमी के दिन राधास्वामी नाम जगजाहिर किया था। इसी कारण वसंत पंचमी को ही राधास्वामी मत का स्थापना दिवस माना जाता है। हजूर महाराज की कुल परंपरा में ही दादाजी महाराज हैं। वे प्रसिद्ध इतिहासज्ञ और पुरातत्ववेत्ता हैं। आगरा विश्वविद्यालय के दो बार कुलपति रहे हैं। हजूरी भवन में सतसंगियों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए प्रतिदिन सतसंग होता है। यहां निःशुल्क भोजन की भी व्यवस्था है।
छाया वासंती रंग
राधास्वामी मत के स्थापना दिवस वसंत पंचमी पर मत के आदि केन्द्र हजूरी भवन पीपल मंडी, दयालबाग और स्वामी बाग में बड़े कार्यक्रम होने जा रहे हैं। हजूरी भवन में दोपहर 12 बजे से विशेष सतसंग होगा। यहां सबकुछ वासंती रंग में नजर आ रहा है। देश-विदेश से हजारों सतसंगी आए हुए हैं। अपने गुरु की वाणी सुनने के लिए लालायित हैं। दयालबाग में प्रातःवेला में कई प्रतियोगिताएं हुईं। खेलकूद प्रतियोगिताओं के परिणाम भी घोषित कर दिए गए हैं। सोमवार शाम को दयालबाग के प्रेमनगर गेट पर कार्यक्रम है। यहां दीप प्रज्ज्वलन किया जाएगा। समूचा दयालबाग वसंती रंग में रंगा हुआ है। यहां जाने पर मन प्रफुल्लिलत है। गुरु प्रेम सरन सतसंगी के आशीर्वाद से हर कोई निहाल है। स्वामी बाग में राधास्वामी मत के संस्थापक परमपुरुष पूरनधनी स्वामी जी महाराज की समाध है। इसे ही दयालबाग मंदिर कहा जाता है। समाध में मत्था टेकने वालों की लाइन लगी हुई है।
पन्नी गली में रहते थे स्वामी जी महाराज
राधास्वामी मत के संस्थापक परमपुरुष पूरनधनी स्वामी जी महाराज पन्नी गली, आगरा में रहते थे। वहीं से उन्होंने राधास्वामी मत की उद्घोषणा की। इस कारण सभी सतसंगी पन्नी गली जाकर मत के पहले गुरु का निवास स्थान भी देखते हैं। यहां पूरे दिन आवाजाही लगी रहती है। इस स्थान को भी नया रूप प्रदान किया गया है। सतसंगी राजीव उपाध्याय ने बताया कि स्वामी जी महाराज जहां साधना करते थे, उस कक्ष के दर्शन करने से ही मन प्रफुल्लित हो जाता है। उन्होंने कहा कि आगरावासियों को अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए यहां श्रद्धापूर्वक आना चाहिए। यह गर्व की बात है कि दुनिया को सतपथ पर लाने वाले राधास्वामी मत की स्थापना आगरा में हुई। हजूरी भवन से दादाजी महाराज (प्रोफेसर अगम प्रसाद माथुर) उस पथ को सतत रूप से आलोकित कर रहे हैं।

Published on:
22 Jan 2018 09:39 am

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