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मुस्लिमों के लिए खास है बारावफात, जानिए क्यों मनाते हैं

ईद मिलादुन्नबी के दिन हमें यह तय करना है कि हम सभी मुसलमानों को नबी के बताए हुए रास्ते पर ही चलना है।

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Barawafat

बारावफात क मौके पर मस्जिद पर रोशनी।

14 रवी-उल-अव्वल 1441 हिजरी यानी जश्ने ईद मिलादुन्नबी का दिन मुसलमानों के लिए सबसे अव्वल दिन माना जाता है। यह वही दिन है, जब हजरत मोहम्मद सल्ललाहो अलैहि वसल्लम इस सरजमी पर तशरीफ़ फरमाकर इस्लाम मजहब को रोशन करते हुए बुत परस्त मुसलमान को अल्लाह पाक के सामने झुक कर अपनी मुराद मांगने की हुक्म देते हुए तबलिक की। आज तक दुनिया का मुसलमान हजरत मोहम्मद के बताए हुए रास्ते पर चलने की कोशिश करते हुए इस दिन को जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी (बारावफात) के रूप में मनाते हुए मस्जिदों, मदरसों और अपने-अपने मकानों पर रोशनी करते हैं। गरीब बच्चों को अच्छे-अच्छे पकवान बनाकर खिलाते हैं।

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इस्लाम मजहब के उलमा फरमाते हैं कि अल्लाह का फरमान है कि मेरे नाम से पहले मेरे नबी मोहम्मद सल्लाहो अलैहि वसल्लम का नाम लो। तभी में अपने बंदों की फरियाद को सुनूंगा।

12 रवी-उल-अव्वल का दिन हमारे नबी करीम की वफात का भी दिन है। लेकिन मुसलमान इस दिन को बारावफात का दिन भी कहते है। कैंथ वाली मस्जिद के मुतावल्ली मोहम्मद शरीफ ने बताया कि हमारे नबी का फरमान है कि जिस मुल्क में आप पैदा हुए है, उसके वफादार बनो। गरीब को कतई न सताएं, बल्कि उस गरीब की जितनी हो सके मदद करे। झूठ मत बोलो। माँ- बाप की खिदमत करो। बुजुर्गों और अपने से बड़ों की इज़्ज़त करो। अपनी जुबान से कभी ऐसे बोल मत बोलो जिसकी वजह से दूसरे को दुख पहुंचे। यह मेरा यकीन है, जो नबी करीम के बताए हुए रास्ते पर नहीं चलेगा वह शख्स कभी खुश नहीं रह सकता।

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हजरत मोहम्मद सल्लाहो अलैहि वसल्लम का फरमान है कि सामने वाले पर अंगुली उठाने से पहले यह सोचो कि बाकी की अंगुलियां खुद की तरफ आ रही है। मुसलमानों की एक हदीस में लिखा है, एक बूढ़ी औरत ने हुज़ूर से पूछा कि मेरी बेटी गुड़ बहुत खाती है। वह गुड़ न खाए, ऐसी कोई तरकीब बताइए। तब हुज़ूर ने उस बूढ़ी औरत से कहा जाओ आप कल तशरीफ़ लेकर आना। दूसरे दिन जब वह बूढ़ी औरत हुज़ूर के दर पे गई तब हुज़ूर ने उस औरत को तरकीब बताई। तब वह बूढ़ी औरत हुज़ूर से बोली कि आप यह तरकीब कल भी बता सकते थे। तब हुज़ूर ने फरमाया की कल तक मैं खुद गुड़ खाता था। पहले मैंने खुद गुड़ खाना छोड़ा, उसके बाद आपको बताया। इसलिए किसी को उपदेश देने से पहले आप खुद अपने बारे में जानने की कोशिश करें।

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आज इस ईद मिलादुन्नबी के दिन हमें यह तय करना है कि हम सभी मुसलमानों को नबी के बताए हुए रास्ते पर ही चलना है।

प्रस्तुतिः डॉ. सिराज क़ुरैशी

अध्यक्ष, हिन्दुस्तानी बिरादरी, भारत सरकार द्वारा कबीर पुरस्कार से सम्मानित।