
मन की बात में पीएम मोदी ने की आफरीन की मेहनत की तारीफ
अहमदाबाद. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को अपनी ४६वीं 'मन की बात' में अहमदाबाद की आफरीन शेख की मेहनत की सराहना की।
उन्होंने गरीबी और विकट परिस्थितियों के बावजूद बेहतर मुकाम और सफलता पाने वाले विद्यार्थियों का उल्लेख करते हुए अहमदाबाद की आफरीन शेख का भी जिक्र किया, जिनके पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं।
अहमदाबाद के जुहापुरा इलाके में रहने वाली आफरीन शेख ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से उनके नाम को मन की बात में पूरे देश के सामने पुकारने और उनकी मेहनत को सराहना देने पर उनकी शुक्रिया कहा। साथ ही यह गुजारिश भी की कि उनके जैसे गरीब वर्ग के लोगों को पढ़ाई का और अपने हुनर व काबीलियत को दिखाने का पर्याप्त मौका मिल सके इसके लिए सरकारी स्कूल और खोले जाएं। गरीब बच्चों को छात्रवृत्ति दी जाए। आफरीन दसवीं की बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुई है।
आफरीन के पिता शेख मोहम्मद हंजेला भी कहते हैं कि सरकार को गरीब और मध्यमवर्ग के लोगों को आर्थिक मदद का उचित प्रबंध करना चाहिए। उनके जैसे कई परिवार हैं जिन्हें सरकार की ओर से दी जा रहीं स्कॉलरशिप (छात्रवृत्तियों) के बारे में जानकारी तक नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को मन की बात में कहा कि अभी जब कॉलेज सीजन की बात हो रही है तो मैं न्यूज देख रहा था कि कैसे मध्यप्रदेश के एक अत्यंत गऱीब परिवार से जुड़े एक छात्र आशाराम चौधरी ने जीवन की मुश्किल चुनौतियों को पार करते हुए सफ़लता हासिल की है।
उन्होंने जोधपुर एम्स की एमबीबीएस की परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में सफ़लता पायी है। उनके पिता कूड़ा बीनकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। मैं उनकी इस सफ़लता के लिए उन्हें बधाई देता हूँ। ऐसे कितने ही छात्र हैं जो गऱीब परिवार से हैं और विपरीत परिस्थियों के बावज़ूद अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जो हम सबको प्रेरणा देता है। चाहे वो दिल्ली के प्रिंस कुमार हों, जिनके पिता ष्ठञ्जष्ट में बस चालक हैं या फिर कोलकाता के अभय गुप्ता जिन्होंने फुटपाथ पर स्ट्रीट लाइट के नीचे अपनी पढ़ाई की। अहमदाबाद की बिटिया आफरीन शेख़ हो, जिनके पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं। नागपुर की बेटी खुशी हो, जिनके पिता भी स्कूल बस में ड्राइवर हैं या हरियाणा के कार्तिक, जिनके पिता चौकीदार हैं या झारखण्ड के रमेश साहू जिनके पिता ईंट-भट्टा में मजदूरी करते हैं। ख़ुद रमेश भी मेले में खिलौना बेचा करते थे या फिर गुडगाँव की दिव्यांग बेटी अनुष्का पांडा, जो जन्म से ही स्पाइनल मस्क्युलर डिस्ट्रोफी नामक एक आनुवांशिक बीमारी से पीडि़त है, इन सबने अपने दृढसंकल्प और हौसले से हर बाधा को पार कर दुनिया देखे ऐसी कामयाबी हासिल की। हम अपने आस-पास देखें तो हमको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे।
Published on:
29 Jul 2018 11:45 pm
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