
अहमदाबाद. गुजरात में हर्निया रोग के चलते प्रतिवर्ष छोटे-बड़े करीब एक लाख ऑपरेशन किए जाते हैं। आरामदायक जीवनशैली के चलते इस रोग में हर वर्ष वृद्धि हो रही है। हर्निया सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से वापी स्थित मेरिल अकादमी में आयोजित कार्याशाल में भाग लेने पहुंचे एल.जी. अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजेश शाह ने यह कहा।
कार्यशाला में देश भर से तीन सौ से अधिक चिकित्सकों ने रोग के विविध पहलुओं पर चर्चा की। डॉ. शाह के अनुसार भारत में कई पद्धतियों से हर्निया के ऑपरेशन किए जाते हैं। वर्कशोप में हर्निया की विविध पद्धतियों के ऑपरेशनों पर चर्चा एवं उनका प्रदर्शन किया गया। हर्निया सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके डॉ. शाह ने कहा कि हर एक हजार लोगों में से कम से कम एक व्यक्ति हर्निया का शिकार है। राज्य में लगभग एक लाख लोगों का हर्निया का ऑपरेशन भी होता है। आरामदायक जीवन शैली इसका मुख्य कारण माना जाता है। वर्क शोप में सोसायटी के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. आर.एन. दीक्षित, डॉ. डी.पी. चिखलिया(जूनागढ़), डॉ. जतिन पी. देसाई (सूरत) तथा डॉ. एम.एम. कुरेशी (वलसाड) समेत तीन सौ से अधिक चिकित्सक मौजूद रहे।
एनएमसी बिल गरीब विरोधी
एमसीआई के पूर्व अध्यक्ष डॉ. देसाई व आईएमए के अध्यक्ष डॉ. वानखेड़कर ने ठीक नहीं माना
अहमदाबाद. मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष डॉ. केतन देसाई एवं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. रवि वानखेड़कर ने केन्द्र सरकार की ओर से लाए जाने वाले नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) बिल को ठीक नहीं माना। डॉ. वानखेड़कर ने इसे गरीब विरोधी भी बताया।
एमसीआई के पूर्व अध्यक्ष डॉ. देसाई ने कहा कि बिल के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए आईएमए और एमसीआई के पदाधिकारियों को बुलाया गया था। जिस तरह से बिल में शर्तें रखी गईं हैं उससे लगता है कि इन दोनों संस्थाओं की सहमति नहीं ली गई है। एनएमसी को एमसीआई की जगह पर लाना ठीक नहीं है। उधर, आईएमए के अध्यक्ष डॉ. वानखेड़कर ने इस बिल को गरीब विरोधी बताया है। उन्होंने कहा कि हालांकि इस बिल को लोकसभा में भेजने की जगह अभी से स्टेंडिंग कमेटी में रिव्यू के लिए भेजा गया है। जिससे लगता है कि बिल में कमी होने का आभास जरूर हुआ है। इस मुद्दे पर २४ जनवरी को आईएमए से भी बातचीत करने के लिए कहा गया है। डॉ. वानखेड़कर के अनुसार यदि यह बिल लागू हुआ तो इससे स्वास्थ्य सेवाएं जरूर प्रभावित होंगी। इससे चिकित्सकों की संख्या हर वर्ष कम होगी। बिल में जिस एमसीक्यू परीक्षा का उल्लेख किया गया है यदि उसमें दस फीसदी मेडिकल के स्टूडेंट फैले हुए तो प्रतिवर्ष सात हजार चिकित्सकों की कमी आएगी। उनके अनुसार एमबीबीएस बनने के लिए विद्यार्थी को तीन दर्जन (३६) परीक्षाओं में से गुजरना पड़ता है। जबकि बिल में एक दिन की परीक्षा का महत्व दिया गया है जो अनियमितता फैला सकती है। इव कॉन में भाग लेने पहुंचे डॉ. देसाई एवं डॉ. वानखेड़कर ने रविवार को विशेष बातचीत में यह कहा।
Published on:
21 Jan 2018 09:43 pm
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