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गुजरात विद्यापीठ के कुलाधिपति चयन पर विवाद बढ़ा, 9 न्यासियों का सामूहिक इस्तीफा

Gujarat vidyapith Chancellor appointment issue: 9 trustee resigns कुलाधिपति पद पर गैर गांधीवादी राज्यपाल आचार्य देवव्रत के चयन को बताया राजनीतिक दवाब में लिया गया निर्णय, 11 अक्टूबर को ही राज्यपाल ने स्वीकारा है कुलाधिपति बनने का प्रस्ताव

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गुजरात विद्यापीठ के कुलाधिपति चयन पर विवाद बढ़ा, 9 न्यासियों का सामूहिक इस्तीफा

गुजरात विद्यापीठ के कुलाधिपति चयन पर विवाद बढ़ा, 9 न्यासियों का सामूहिक इस्तीफा

Ahmedabad. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की ओर से स्थापित गुजरात विद्यापीठ के नए कुलाधिपति (चांसलर) पद पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत के चयन पर विवाद बढ़ गया है। इस पद के लिए गैर गांधीवादी आचार्य देवव्रत का चयन होने से नाराज गुजरात विद्यापीठ के 9 न्यासियों (ट्रस्टियों) ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने इसे राजनीतिक दबाव में आकर और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय करार दिया है। इस्तीफा देने वाले न्यासियों में नरसिंहभाई हठीला, सुदर्शन आयंगर, अनामिक शाह, मंदाबेन परीख, उत्तमभाई परमार, चैतन्य भट्ट, नीताबेन हार्डिकर, माइकल मांजगांवकर और कपिल शाह शामिल हैं। इन सभी ने चार पृष्ठों का एक सामूूहिक पत्र लिखकर अपना सामूहिक इस्तीफा भेजा है। हालांकि इसमें से पांच न्यासियों का कार्यकाल मंगलवार को खत्म हो रहा है। मंगलवार को गुजरात विद्यापीठ का दीक्षांत समारोह भी है। उससे पहले ही सामूहिक इस्तीफा दिया गया है।
गुजरात विद्यापीठ के 12वें कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल आचार्य देवव्रत को बहुमत के आधार पर चुना गया है। स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के चलते गुजरात विद्यापीठ की 11वीं कुलाधिपति इलाबेन भट्ट ने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसे स्वीकार कर लिया गया। समाजसेवी और सेवा संस्था की संस्थापिका इलाबेन 7 मार्च 2015 से विद्यापीठ की कुलाधिपति के पद पर हैं। हाल ही में चार अक्टूबर को आयोजित विद्यापीठ की गवर्निंग काउंसिल की बैठक में इलाबेन भट्ट के इस्तीफे को स्वीकार करते हुए उनकी जगह बहुमत के आधार पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत को नया कुलाधिपति बनाए जाने का निर्णय किया गया। इस प्रस्ताव को राज्यपाल की ओर से 11 अक्टूबर को ही स्वीकृति भी दे दी गई है।
सामूहिक इस्तीफा देने वाले न्यासियों में शामिल मंदाबेन परीख ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि हमारा विरोध हमारा कुलाधिपति को चयनित करने का अधिकार छीने जाने को लेकर है। 1963 में विद्यापीठ को जब यूजीसी ने एक स्वायत्त संस्था की मंजूरी दी तब कहा था कि वे विद्यापीठ की स्वायत्ता से छेड़छाड़ नहीं करेंगे। लेकिन कुलाधिपति के चयन के मामले में राजनीतिक दबाव डालकर निर्णय कराया गया। इसके लिए अनुदान बंद करने की धमकी दी जा रही है। यह गलत है। शिक्षा संस्थानों की स्वायत्ता बनाए रखने की जरूरत है। गांधीजी के विचारों से समझौता किया जा रहा है, जिसके चलते हम 9 न्यासियों ने सामूहिक इस्तीफा न्यासी मंडल को भेज दिया है।

विद्यापीठ के मूल्यों, सिद्धांतों को चढ़ाई बली
चार पृष्ठ के सामूहिक इस्तीफा पत्र में न्यासियों ने कहा कि वे मानते हैं कि कुलपति का चयन जल्दबाजी में, राजनीतिक दबाव, भय और धमकी के चलते, उचित प्रक्रिया एवं संवाद को दरकिनार करके किया गया है। पद के लिए अन्य योग्य व्यक्तियों के नाम पर विचार किए बिना चयन किया है। हमारा मानना है कि यह निर्णय संस्था की आत्मा को दरकिनार करके मात्र इसके शरीर को बचाने के लिए किया गया है। इस प्रक्रिया में तात्कालिक लाभ के लिए मूल्यों और सिद्धांतों की बली चढ़ा दी गई है।

न्यासियों के इस्तीफे को विद्यापीठ ने किया अस्वीकार
गुजरात विद्यापीठ के कार्यकारी कुलसचिव डॉ. निखिल भट्ट की ओर से जारी बयान में बताया कि 9 ट्रस्टियों ने सामूहिक रूप से बयान जारी कर 8 ट्रस्टियों के इस्तीफे भेजे हैं। सोमवार को विद्यापीठ मंडल की बैठक हुई। उसमें निर्णय किया गया कि इन इस्तीफों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इन ट्रस्टियों से बातचीत की जाएगी। इसके लिए अलग अलग न्यासियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।