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गुलियन बेरी सिंड्रोम से गंभीर अवस्था में पहुंची मूकबधिर युवती को बचाया

अस्पताल में हृदय बंद होने से 15 मिनट तक देना पड़ा सीपीआर,लाखों रुपए में होने वाला उपचार नि:शुल्क

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गुलियन बेरी सिंड्रोम से गंभीर अवस्था में पहुंची मूकबधिर युवती को बचाया

गुलियन बेरी सिंड्रोम से गंभीर अवस्था में पहुंची मूकबधिर युवती को बचाया

अहमदाबाद. गुलियन बेरी सिंड्रोम (जीबीएस) के चलते गंभीर अवस्था में पहुंची मूकबधिर युवती काजल परमार (25) को आखिरकार नया जीवन मिल गया। राजकोट के निकट एक गांव की रहने वाली इस युवती के अन्य अंगों में संक्रमण था, साथ ही हार्ट अटैक आने के दौरान हृदय बंद होने से 15 मिनट तक कार्डियोपल्मोनरी रिसुसिटेशन (पीसीआर) की जरूरत हुई। लंबे उपचार के बाद हाल में उसकी स्थिति में सुधार बताया गया है।

जन्म से ही मूकबधिर काजल के पति भी मूकबधिर हैं। करीब चार माह पूर्व अचानक काजल को तेज बुखार आया था। उस दौरान सांस लेने में तकलीफ और मांसपेशियों में कमजोरी जैसे अन्य कई लक्षण सामने आए थे। जरूरी जांच कराने पर उसमें जीबीएस की पुष्टि हुई। बैक्टीरिया और वायरस के कारण होने वाली यह बीमारी मरीज के श्वसन तंत्र और तंत्रिका तंत्र को काफी हद तक कमजोर कर देती है। ऐसे में सांस लेने में दिक्कत और पैरों का विकलांग अवस्था में होना आम बात हो जाती है। इन सभी लक्षणों से काजल गुजर रही थी। इस अवस्था में राजकोट के अस्पताल में वह वेंटिलेटर पर थी। इसके बाद कई अस्पतालों में युवती ने उपचार कराना चाहा लेकिन जीबीएस इस हद तक बढ़ रहा था कि उसकी जान जोखिम में पडऩे लगी। करीब ढाई माह पूर्व इस युवती को अहमदाबाद के नरोडा रोड स्थित गुजरात कैंसर सोसायटी (जीसीएस) अस्पताल में भर्ती करवाया गया। अस्पताल में दाखिल किए जाने के समय् वह काफी गंभीर अवस्था में थी।यहां इलाज के दौरान उसे हार्ट अटैक भी आया तब 15 मिनट तक पीसीआर की बदौलत उसने होश संभाला था। हालांकि उसके किडनी, लिवर जैसे प्रमुख अंगों में संक्रमण लग चुका था, जिससे उसकी हालत गंभीर हो गई थी।

पौने दो माह वेंटिलेटर पर रही, अपने दम पर लेने लगी सांस

अस्पताल के चिकित्सक व टीम के अन्य सदस्यों को इस मूक बधिर युवती से सांकेतिक भाषा में संवाद करने के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ा। अस्पताल के चिकित्सक डॉ. भावेश शाह, डॉ. अपरा कोठियाला, डॉ. बंकिमचंद्र मांकड़ और उनकी टीम ने काजल के उपचार के लिए जोर लगाया। यह युवती 45 दिनों के वेंटिलेटर सपोर्ट के बाद अपने दम पर सांस लेने में सक्षम हुई। 70 दिनों के इस इलाज में दूसरे अस्पतालों में उसके लाखों रुपये खर्च हो सकते थे, लेकिन यहां आयुष्मान भारत योजना (पीएम-जेएवाई) के तहत मुफ्त इलाज हुआ।