
भगवतदयालसिंह
ब्यावर। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में ब्यावर का भी नाम महत्वपूर्ण था। ब्यावर में आजादी से पहले ही तिरंगा फहरा दिया गया था। आजादी से पहले 1930 में तिरंगा फहराने का पूरे देश में एक संदेश गया। आजादी के आंदोलन में रत देशवासियों का उत्साह बढा। नगर परिषद के भवन में कमिश्नर बैठा करते थे। यहां पर लगे शिलालेख तत्कालीन शासन व्यवस्था की याद दिलाते हैं।
ब्यावर ने आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो आजादी के बाद भी कई आंदोलन का साक्षी रहा। सूचना के अधिकार का आगाज ब्यावर के चांगगेट से हुआ। गणतंत्र दिवस के मौके पर ब्यावर के अतीत पर नजर डालें तो गौरवशाली व व्यापारिक रूप से मजबूत शहर रहा। यही कारण रहा कि स्वतंत्रता सेनानियों का ब्यावर आना-जाना लग रहता था।
प्रदेश की पहली म्यूनिसिपल होने का गौरव रखने वाली ब्यावर नगर परिषद पर वर्ष 1930 में तिरंगा फहरा दिया गया था। देश भले ही 1947 में आजाद हुआ, लेकिन नगर परिषद भवन पर 1930 में ही तिरंगा झंडा फहरा दिया गया। इस भवन का नक्शा स्कॉटलैंड के एडिनबरा शहर के टाउन हॉल के अनुरूप ही बनाया गया है। एक मई 1867 को ब्रिटेन सरकार की बागडोर ईस्ट इंडिया कम्पनी से लेकर मेरवाड़ा स्टेट में कमिश्नरी अपने अधीन लेकर कमिश्नर नियुक्त किया। यह कमिश्नर कार्यालय मुख्य बाजार में चलता था।
इसके बाद स्कॉटलैंड के एडिनबरा शहर के टाउन हाल के अनुरूप ही ब्यावर में टाउन हॉल बनाया गया। इसका लोकार्पण 14 फरवरी 1910 में तत्कालीन काल्विन कमिश्नर ने किया। इस भवन का नाम भी काल्विन हॉल रखा गया। देश आजाद होने के बाद इसका नाम नेहरू भवन कर दिया गया।
1920 के बाद नाथूलाल को चेयरमैन नियुक्त किया गया। 26 जनवरी 1930 को भारतीय व अंग्रेजों के बीच मिल-जुलकर शासन करने का प्रस्ताव पारित किया था। इस दौरान ही नगर परिषद पर तिरंगा फहरा दिया गया। यहां पर अंग्रेज अफसर बैठते थे। ब्यावर में होने वाली हलचल अंग्रेज हुकूमत तक सीधी पहुंचती थी जो कि बहुत महत्वपूर्ण हुआ करती थी।
आजादी के आंदोलन से भी ब्यावर का नाता रहा है। जब आजादी का आंदोलन चल रहा था। औद्योगिक दृष्टि से ब्यावर विकसित शहर था। इसका औद्योगिक वैभव की क्षेत्र में पहचान थी। उस समय स्वतंत्रता सेनानियों का ब्यावर में आना-जाना लगा रहता था। यहां पर स्वतंत्रता सेनानियों को श्यामगढ़ के किले में प्रशिक्षण दिया जाता था।
ब्यावर स्वतंत्रता सेनानियों की तपोभूमि रही है। इनमें से मुख्य नानाजी फडनवीस, तात्यां टोपे, रास बिहारी बोस, चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगतसिंह, केसरीसिंह बारहठ, जोरावरसिंह बारहठ, प्रतापसिंह बारहठ, ठाकुर गोपालसिंह खरवा, विजयसिंह पथिक, अर्जुनलाल सेठी थे। इसी तरह ब्यावर शहर कई महान सपूतों की कर्मस्थली रहा। इनमें मुख्य सेठ दामोदरदास राठी, सेठ घीसूलाल जाजोदिया, स्वामी कुमारानन्द, श्यामजी कृष्ण वर्मा आदि थे।
पुराने समय में ब्यावर को नया शहर के साथ ही परकोटा वाला शहर भी कहकर पुकारते थे। शहर के अजमेरी गेट, मेवाड़ी गेट, चांग गेट और सूरजपोल गेट को आपस में यह परकोटा जोडता था। इन द्वारों के भीतर का क्षेत्र ब्यावर का मुख्य बाज़ार है। ब्यावर शहर का महत्व इसलिए भी है कि 1866 में ब्यावर में एक नगर परिषद की स्थापना की गई थी। वर्ष 1880 में रेलवे शहर में पहुंच गई। इस कालखंड में ही कपडा मिले भी संचालित होना शुरू हो गईं। इसके चलते इसका ऐतिहासिक महत्व रहा है।
Updated on:
26 Jan 2025 09:08 pm
Published on:
26 Jan 2025 06:49 pm
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