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rajasthan ka ran : कुछ समय पहले तक टिकट पाने के लिए नहीं लगते थे मेले, कुछ इस तरह होता था उस समय चुनावी समर

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Election 2018 : राजस्थान में सरकार किसी की भी हो, मंत्रिमंडल में रहता है सिर्फ यहां का दबदबा, ये रहा सबूत

Election 2018 : राजस्थान में सरकार किसी की भी हो, मंत्रिमंडल में रहता है सिर्फ यहां का दबदबा, ये रहा सबूत

दिलीप शर्मा . अजमेर. अब से पचास वर्ष पहले की राजनीति का माहौल ही कुछ और होता था। दावेदार या समर्थक की संपन्नता, प्रभाव व जाति को नहीं देखा जाता था। टिकट घर भेज कर चुनाव लडऩे का आग्रह किया जाता था। बात के धनी इतने होते थे कि चुनाव लडऩे का आग्रह यदि पहले किसी ने कर दिया तो दूसरे स्वयं पीछे हट जाते थे। तब एक दूसरे की भावनाओं को बेहद गंभीरता से लिया जाता था। हम बात कर रहे हैं आज से पचास वर्ष पहले1968 की।

मेवाड़ के गांधी के नाम से प्रख्यात गांधीवादी नेता चांदमल सकलेचा की। जीवन पर्यन्त सकलेचा ने कोई चुनाव नहीं लड़ा और पार्टी ने जो जिम्मेदारी उन्हें सौंपी उसे बखूबी निभाया। भारतीय जीवन बीमा निगम अजमेर में प्रशानिक अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त बी. एल. सामरा सकलेचा के सगे फूफा हैं। सामरा ने राजस्थान पत्रिका को सकलेचा के संस्मरण सुनाते हुए बताया कि एक बार पार्टी ने सकलेचा से टिकट की पेशकश की तब वहां के जमींदार परिवार की बेटी ने उनसे आग्रह किया कि वह भी युवा है और उन्हें चुनाव का मौका दिया जाना चाहिए। इस पर सकलेचा पीछे हट गए।

जमींदार परिवार की यह बेटी देवगढ़ राव साहब की बहन प्रख्यात साहित्यकार लक्ष्मी कुमारी चूंडावत थी। लक्ष्मी कुमारी सीता देवी की बहन थीं जिनका विवाह पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से हुआ था। देवगढ़ परिवार की बेटियों ने अजमेर के मेयो कॉलेज में पढ़ाई की। बाद में लक्ष्मी देवी चूंडावत देवगढ़ की विधायक भी बनीं और राजस्थानी साहित्य के क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्श्री से भी सम्मानित की गईं।

बेटे की भी सिफारिश नहीं की

सकलेचा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड तथा खादी ग्रामोद्योग मंडल के चेयरमैन रहे। लेकिन उन्होंने जीवन भर कभी अपने निजी स्वार्थ के लिए राजनीति प्रभाव का इस्तेमाल नहीं किया। क्षेत्र के दो निजी बस ऑपरेटर ने उन्हें फ्री पास दे रखा था फिर भी उन्होंने बस का यात्री कर सरकारी टैक्स के रूप में राशि अदा किया। छोटा बेटा बिट्स पिलानी से प्रथम श्रेणी में ऑनर्स में इंजीनियरिंग की। उसे नौकरी के लिए कई जगह ठोकरें खानी पड़ी। नौकरी के दौरान उसके पिछले 8 साल में उसके 18 ट्रांसफर हुए। तब भी सकलेचा का स्पष्ट कहना था कि अगर नौकरी करनी है तो सरकार जहां भी भेजे वहां जाने के लिए तैयार रहो, उनसे किसी प्रकार की सिफारिश की उम्मीद मत रखो।


सादगीपूर्ण जीवन

सकलेचा की वेशभूषा श्वेत वस्त्र थे। वे केवल दो ही पोशाक का उपयोग करते थे। धोती, कुर्ता, टोपी रूमाल, मफलर यहां तक कि थैला भी खादी का होता था। सकचेला अपने जीवनकाल में 50 वर्षों तक नियमित रूप से डायरी लिखा करते थे। अंतिम 18 सालों में भी उन्होंने नियमित गांधी डायरी लिखी। 95 वर्ष की अवस्था में उनका देहावसान हुआ।