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Ajmer ki soni ji ki nasiyan : अजमेर के सोनीजी की नसियां में ऐसी प्रतिमाएं विराजित, जिनका साल में एक बार होता अभिषेक

पर्युषण पर्व के दौरान भादवे की पूर्णिमा को पंचामृत अभिषेक की परम्परा यह प्रतिमाएं विलक्षण,चमत्कारित,विशेष रहस्यमयी और कथाओं से जुड़ी है

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Ajmer ki soni ji ki nasiyan: अजमेर के सोनीजी की नसियां में ऐसी प्रतिमाएं विराजित, जिनका साल में एक बार होता अभिषेक

Ajmer ke soneejee kee nasiyaan : अजमेर के सोनीजी की नसियां में ऐसी प्रतिमाएं विराजित, जिनका साल में एक बार होता अभिषेक

अजमेर. दिगम्बर जैन मंदिर (Digambar Jain Temple) में कलशाभिषेक की प्राचीन परम्परा है। चौबीस तीर्थंकरों की प्रतिमाओं का मंत्रोच्चार से मंदिरों में नियमित पंचामृत अभिषेक होता है। पर, अजमेर की सोनीजी की नसियां (soneejee kee nasiyaan) में भादवे की पूर्णिमा पर अनोखा अभिषेक होता आया है। इसमें स्वर्ण, रजत, माणक-पन्ने, स्फटिक और अन्य धातुओं से निर्मित प्रतिमाएं शामिल होती हैं। आम दिनों में इनके दर्शन नहीं किए जा सकते। सालभर यह प्रतिमाएं अदृश्य व सुरक्षित रहती है।

यूं तो सोनीजी की नसियां स्वर्णिम अयोध्या नगरी के नाम से प्रसिद्ध है। जैन समाज (Jain society) के ही अधिकतर लोग इन तीर्थंकरों की बेशकीमती प्रतिमाओं और उनके अभिषेक परम्परा से वाकिफ नहीं है। प्रतिवर्ष भादवे की पूर्णिमा पर ही पारंपरिक अभिषेक किया जाता है। यह प्रतिमाएं अपनी बनावट में भी भव्य हैं। शुक्रवार को हुए अभिषेक में प्रमोद सोनी, निर्मलचंद, नवीनचंद, अनिल, विपिन जैन और अन्य मौजूद रहे।

शेष प्रतिमाओं का पक्षाल व जलाभिषेक नित्य

जैन मंदिरों में वेदी पर प्रतिष्ठित मूलनायक सहित अन्य प्रतिमाओं की रोजाना पक्षाल व बाद में जलाभिषेक की परम्परा (Jalabhishek tradition) है। कई जैन परिवार तो तडक़े 5 बजे ही यह मनोहारी दर्शन करने पहुंच जाते हैं। वैसे यह सिलसिला सुबह 7 बजे तक चलता रहता है। पक्षाल से तात्पर्य गीले व सफेद वस्त्र से प्रतिमाओं की सफाई से हैं। जिनालयों में विशेष तिथि या समारोह को को छोड़ रोजाना शाम को प्रतिमाओं का अभिषेक नहीं होता।

इन प्रतिमाओं का होता अभिषेक : भगवान आदिनाथ, भगवान चंद्रप्रभु, भगवान महावीर स्वामी, दो चौबीसी प्रतिमाएं, पद्मासन और खड्गासन प्रतिमाएं
इन धातुओं से निर्मित मूर्तियां : सोना, चांदी, माणक, मोती, पन्ना, स्फटिक

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यूं होता है अभिषेक

परम्परानुसार प्रतिमाओं को विराजित किया जाता है। इसके बाद विशेष अभिषेक किए जाते हैं। इसके बाद स्वर्ण झारी से (After this with golden gale) शांतिधारा होती है। विशेष जल (गंधोधक) को वितरित किया जाता है। लोग पेड़-पौधों अथवा घरों की दीवारों पर यह जल छिडक़ते हैं। इससे घर में शुद्धि, शांति,स्मृद्धि और प्रभु जिनेन्द्र की कृपा होने की आस रहती है।