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छात्रसंघ चुनाव बदल सकते हैं ये समीकरण, करनी होगी कांग्रेस और बीजेपी को मेहनत

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big issues in election

big issues in election

अजमेर.

छात्रसंघ चुनाव में कम मतदान, बागियों और निर्दलीयों की नाराजगी नतीजे पर असर डाल सकती है। इसको लेकर प्रत्याशियों, छात्र संगठनों सहित कांग्रेस और भाजपा नेताओं की नींद उड़ गई है। एक तरफ कम मतदान ने नौजवानों की घटती चुनावी भागीदारी का संकेत हो सकती है। वहीं आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को भी कड़ी मेहनत का सबक दे सकती है।

एपीसी-जीसीए में अध्यक्ष पद पर सबकी निगाहें हैं। यहां एनएएसयू्आई और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और निर्दलीय प्रत्याशियों के कड़ी टक्कर है। यहां 4 हजार 939 विद्यार्थियों ने मतदान नहीं किया। कम मतदान से नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।

इसी तरह दयानंद कॉलेज में भी 870 विद्यार्थियों ने वोट नहीं दिया। यहां भी एनएसयूआई और विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशियों और बागियों में सीधी टक्कर है। मदस विश्वविद्यालय में एनएसयूआई-अभाविप और निर्दलीय प्रत्याशी में करीबी मुकाबला है। अधिकतर संस्थाओं में छात्र संगठनों के कई कार्यकर्ताओं ने बागियों-निर्दलीयों को अंदरूनी समर्थन दिया।

करनी पड़ेगी ज्यादा मेहनत

प्रदेश में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। छात्रसंघ चुनाव में कम मतदान युवाओं की चुनावों में अरुचि का संकेत है। इसको देखते हुए कांग्रेस और भाजपा को विधानसभा चुनाव में ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है। ताकि विधानसभा चुनाव में अधिकाधिक मतदान हो सके। मालूम हो कि लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय, पंचायत और अन्य चुनाव में युवा मतदाताओं की तादाद ज्यादा रहती है।

जातीय आधार भी हावी

छात्रसंघ चुनाव बीते सात-आठ साल से जातीय आधार हावी हो रहा है। एसपीसी-जीसीए दयानंद कॉलेज, राजकीय कन्या महाविद्यालय और एमडीएस विश्वविद्यालय में नागौर, कुचामन, मेड़ता, रेण, डीडवाना और अन्य इलाकों के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। यही वजह है कि छात्र संगठन प्रतिवर्ष कुछेक समुदाय के प्रत्याशियों को ही मैदान में उतार रहे हैं। यद्यपि दलित वर्ग और ओबीसी विद्यार्थी भी खासी तादाद में हैं, पर इन्हें कार्यकारिणी के अन्य पदों पर टिकट दिए जाते हैं।


सरकार की राह है कठिन

आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अंदरूनी स्तर पर तैयारियां शुरू हो गई हैं। दोनों प्रमुख सियासी दलों से जुड़े नेताओं, मंत्रियों और कार्यकर्ताओं के अलावा निर्दलीय और अन्य दलों के प्रत्याशी भी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। अजमेर जिले में मसूदा, केकड़ी, ब्यावर, किशनगढ़, पुष्कर, नसीराबाद, अजमेर उत्तर, अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र हैं। जबकि अजमेर संभाग में जयपुर जिले का दूदू, भीलवाड़ा, टोंक और नागौर के विधानसभा क्षेत्र भी आते हैं। सियासी दलों को प्रमुख रूप से अजमेर शहर को 24 घंटे जलापूर्ति, भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी ही प्रमुख मुद्दे नजर आ रहे हैं।