
low vote caste in election
रक्तिम तिवारी/अजमेर।
मतदाताओं की जागरुकता, चुनाव में सक्रिय भागीदारी और मतदान का संवैधानिक अधिकार किसी भी लोकतांत्रिक देश की असली पहचान होते हैं। काफी हद तक कॉलेज और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराने का मकसद भी यही है। ताकि युवा पीढ़ी लोकतंत्र को करीब से समझे, जाने और उसकी हिस्सेदार बन सके। राजस्थान और देश के विभिन्न प्रांतों में गुजरे कुछ वर्षों में कई उच्च शिक्षण संस्थान खुले हैं। युवाओं में आई जागरुकता के चलते देश में उच्च शिक्षा का नामांकन स्तर भी करीब 25 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया है। लेकिन छात्रसंघ चुनाव में उनकी सक्रियता घटती दिख रही है।
मताधिकार का प्रयोग ही नहीं किया
अजमेर सहित उदयपुर, जोधपुर, जयपुर, अलवर, बीकानेर, कोटा और अन्य विश्वविद्यालयों, सरकारी एवं निजी कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव हुए। अधिकांश संस्थानों में लगभग पचास फीसदी छात्र-छात्राओं ने मताधिकार का प्रयोग ही नहीं किया। या तो वे चुनाव के दिन गैर हाजिर रहे या कहीं ना कहीं खुद को व्यस्त रखा। छात्रसंघ चुनाव में हुए कम मतदान ने चुपके से कई संकेत दे दिए हैं।
चुनाव के नतीजों ने विश्वविद्यालय-कॉलेज में दमखम ठोकने वाले एनएसयूआई, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और अन्य छात्र संगठनों की नींद उड़ा दी है। यह भविष्य में किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता का अच्छा विषय भी बन सकता है। मतदान नहीं करने वाले युवाओं ने छात्र राजनीति से बढ़ती दूरी का एहसास कराया है। कहीं ना कहीं वे कॅरियर और पढ़ाई को लेकर ज्यादा चिंतित हैं। वहीं जोशो-खरोश से मतदान करने वाले युवाओं ने अलग ही संदेश दिया है। उन्होंने फिजूल घोषणाओं, दावों और चिरपरित चेहरों को नकारते हुए निर्दलीय को बागडोर सौंपकर छात्र संगठनों को तगड़ा झटका दिया है।
बड़ा संदेश जरूर पहुंचा दिया
हालांकि छात्रसंघ चुनाव भी टिकट की खरीद-फरोख्त से अछूते नहीं रहे। संगठनों के लिए संघर्ष करने वाले छात्र-छात्राओं का हक छिना तो उन्होंने बगावत कर दी। इन्हीं निर्दलीय प्रत्याशियों ने चुनाव जीतकर खुद को सही साबित कर दिखाया। बच्चों के चुनाव नतीजों ने बड़ों यानि कांग्रेस, भाजपा और अन्य राजनैतिक दलों तक बड़ा संदेश जरूर पहुंचा दिया है।
इसी साल राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कुछ अन्य प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होने हैं। छात्रसंघ चुनाव में हुआ कम मतदान युवाओं की चुनावों में अरुचि का इशारा कर रहा है। लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय, पंचायत और अन्य चुनाव में युवा, प्रौढ़, वरिष्ठ मतदाताओं की तादाद ज्यादा रहती है। इसको देखते हुए कांग्रेस और भाजपा को विधानसभा चुनाव में जबरदस्त मेहनत करनी होगी।
राजनीति की प्रारंभिक पाठशाला
छात्रसंघ चुनाव नतीजों ने जातीय आधार पर प्रत्याशी चयन की परिपाटी भी बदली है। राजनैतिक दलों की तरह छात्र संगठनों का दायरा भी दलित, विशेष और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। परिणाम सामने आए तो पिछली धारणाएं ध्वस्त हो गई। कहीं अल्पसंख्यक तो कहीं सामान्य और अन्य संवर्गों के छात्र-छात्राओं ने जीत का परचम लहरा दिया। यह चुनाव राजनीति की प्रारंभिक पाठशाला माने जाते हैं।
चिरपरिचित छवि को त्यागना पड़ेगा
इनका बड़े चुनावी रण में निश्चित तौर पर असर दिखेगा। पहले तो सियासी दलों को मतदाताओं को ज्यादा से ज्यादा मतदान के लिए प्रेरित करना होगा। इसके अलावा दागियों, किसी वर्ग विशेष के नेताओं की जगह स्वच्छ छवि के प्रत्याशियों को मैदान में उतारना होगा। उन्हें सही उम्मीदवार का चयन तो करना ही होगा, साथ में मुद्दा विहीन राजनीति की चिरपरिचित छवि को त्यागना पड़ेगा। यदि इनकी अनदेखी करते हुए ‘बड़े नेता ’ जनता के बीच गए तो नतीजे छात्रसंघ चुनाव से मिलते-जुलते ही होंगे।
Published on:
14 Sept 2018 11:15 am
