
चन्द्र प्रकाश जोशी/अजमेर। जिन्दगी में हिम्मत हारने के बजाय हौसले के साथ मेहनत की जाए तो शारीरिक विकलांगता पर भी पार पाया जा सकता है। शहर में एक ऐसे ही युवक का बसेरा है जो खुद को संभालने में मोहताज होने के बावजूद खुद के वजूद को बाकमाल बचाए हुए है और परिवार पर बोझ बनकर नहीं रहना चाहता। खुद को जिलाए रखने के लिए जिन्दगी से जंग लड़ रहा है जिसका हथियार बना रखी है ट्राइसिकल। इसी तिपहिया साइकिल पर अपनी जिन्दगी को हर सुबह गति देता है और शहर भर में जहां-तहां गोली-बिस्किट बेचकर दिनभर में जो कमाता है शाम को अपने परिवार को थमा देता है।
जन्मजात लकवाग्रस्त
अजमेर के ब्रह्मपुरी एवं इंडिया मोटर चौराहे के पास चन्दनदास (40) जन्म से ही लकवाग्रस्त है। हाथ मुड़े हुए, पैरों से चलने में असमर्थ और बोलने में भी कुछ परेशानी। ऐसी शारीरिक विषमताओं व दुश्वारियों के बावजूद चेहरे पर हमेशा मुस्कान। परिवार भी खस्ताहाल। इस परेशानी और मजबूरी के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी और सरकारी मदद से मिली ट्राईसिकल को ही आमदनी का जरिया और खुद के हौसलों की उड़ान बना ली।
. . बेशक लाचार, मगर नहीं मानी हार
चन्दनदास ने बताया कि जन्म से ही लकवा होने से चलने-फिरने में परेशानी हो रही थी। फिर सोचा मैं क्यूं ना कोई काम कर लूं। जब ट्राईसिकल मिली तो रोजाना इस पर ही गोली-बिस्किट, सुपारी के अलावा पेन, पेन्सिल आदि बेचना प्रारंभ कर दिया। अब प्रतिदिन 200-250 रुपए मिल जाते हैं, जिससे गुजारा हो रहा है।
मासूम भी देता है साथ. . .
नि:शक्त चंदनदास के साथ परिवार का एक बच्चा भी कभी-कभार उसके साथ आता है जो चढ़ाई होने पर ट्राईसिकल को पुश कर उसकी सहायता करता है।
जुनून और खुद्दारी की मिसाल. . .
नि:शक्त व लकवाग्रस्त चन्दनदास की जिन्दगी मुंह बोलती किसी किताब से कम नहीं। शहर में कई स्वस्थ युवा-महिलाएं-बच्चे मेहनत व काम करने के बजाय भीख मांगकर जीवनयापन करते देखे जा सकते हैं। ऐसे लोग घर-परिवार के साथ समाज पर भी बोझ हैं। उनके बीच चंदनदास जुनून की मिसाल है जिसकी जिंदगी से सबक लिया जा सकता है।
Published on:
10 Jul 2021 05:23 pm
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