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देखिए पुलिस की मनमर्जी, चाहें तो कराएं पोस्टमार्टम वरना यूं ही ले जाएं बॉडी

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police settle case

police settle case

अजमेर.

संदिग्ध हालात में मृत्यु के मामले में भी पुलिस कानूनी कार्रवाई और अनुसंधान की बजाए मनमर्जी चलाती है। पुलिस अधिकारी का मन हुआ तो पोस्टमार्टम कराया नहीं तो बिना पोस्टमार्टम ही शव सुपुर्द कर दिया। सबकुछ पुलिस अपने मनमाफिक करके मामले को रफा-दफा कर लेती है।जिला पुलिस में भी बीते कुछ समय से थानों में तैनात पुलिस अधिकारी अपने मन के मुताबिक ही कार्रवाई को अंजाम दे रहे हैं। भले घटनास्थल के हालात कुछ और ही बयां कर रहे हों, लेकिन पुलिस पड़ताल की बजाए मामले को निपटाने की जुगत करती है। वहीं आमजन के साथ घटना पेश आने पर उसकी लाख मिन्नतें भी बेअसर साबित होती हैं। पहले हां फिर हो गई नताजा मामला आदर्शनगर थाने से जुड़ा है।

बदल गया पुलिस का मन

आदर्शनगर नई बस्ती में एक 30 वर्षीय युवक ने बीते दिनों संदिग्ध हालात में दुकान में प्लास्टिक के पाइप से फांसी लगा ली। उसका शव जेएलएन अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया। आदर्शनगर थाने के एएसआई बाबूलाल पोस्टमार्टम कराने पहुंचे। पोस्टमार्टम की दस्तावेजी कार्रवाई शुरू हो गई। मेडिकल ज्युरिस्ट पोस्टमार्टम करने पहुंचे। मामले में प्रथमदृष्ट्या जांच में मृतक के गले पर फांसी का कोई निशान नजर नहीं आया। उन्होंने साथी एक्सपर्ट से चर्चा करते हुए पोस्टमार्टम शुरू करते उससे पहले ही पुलिस का मन बदल गया। पुलिस, परिजन ने पोस्टमार्टम कराने से इनकार दिया।

पुलिस अधिकारी भी परिजन की मर्जी का हवाला देकर शव बिना पोस्टमार्टम सुपुर्द कर दिया पुलिस अधिकारी और परिवार का मन बदलते ही फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के चिकित्सक भी सकते में आ गए। आखिर मेडिकल ज्युरिस्ट ने पीएम रिपोर्ट पर पुलिस अधिकारी से बिना पोस्टमार्टम शव सुपुर्द की कार्रवाई लिखवा ली।

दूसरा मामला

ब्यावर की एक 18 वर्षीय युवती की 17 जनवरी को विषाक्त सेवन से मृत्यु हो गई, लेकिन ब्यावर सदर थाना पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराने की बजाए शव बिना पोस्टमार्टम सुपुर्द कर दिया। इसी तरह ऐसे कई मामले हैं जिनमें पुलिस कार्रवाई की बजाए बिना पोस्टमार्टम की कार्रवाई कर मामला रफा-दफा कर देती है।

चाहते थे फोरी कार्रवाई!

सूत्रों के मुताबिक पुलिस और परिजन मामले में फोरी कार्रवाई (नाम का पोस्टमार्टम) कराना चाहते थे। जब मेडिकल ज्युरिस्ट ने गले से निशान की पड़ताल शुरूआत की तो पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया। ऐसे में युवक की मृत्यु के कारणों का पता ही नहीं चल सका। आखिर किन कारणों और किन हालात में दुकान में प्लास्टिक के पाइप का फंदा बनाकर लटका? यह राज खुलने से पहले ही पुलिस की लचर और फोरी कार्रवाई में घुल गया।

35 दिन में 25 बिना पीएम

जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में साल के पहले महीने में अब तक 35 दिन में 25 व्यक्तियों के शव बिना पोस्टमार्टम सुपुर्द किए जा चुके हैं। वहीं ऐसे कुछ मामले भी जिनकी मृत्यु बीमारी से हुई लेकिन पुलिस बिना पोस्टमार्टम शव सुपुर्द करने को तैयार नहीं थी। इसमें खास बात यह है कि 20 से 30 साल के युवक-युवती की मृत्यु पर भी पुलिस ने पोस्टमार्टम कराकर मृत्यु के कारणों को जानना मुनासिब नहीं समझा।

असाधारण मृत्यु के कारण वाले मामले में पोस्टमार्टम कराना अनिवार्य है। फांसी भी उसमें शामिल है। प्राकृतिक और सामान्य मृत्यु में परिजन की सहमति पर शव बिना पोस्टमार्टम सुपुर्द किया जाता है। आदर्शनगर थाने के मामले की मुझे जानकारी नहीं है। मालूम करता हूं।

कुंवर राष्ट्रदीप, पुलिस अधीक्षक