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Rajasthan-ka-ran: जब चुनाव प्रचार में अचानक हुआ था ऐसा, किशनगढ़ में करना पड़ा था ये काम

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kishangarh seat

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अजमेर.

जिले की राजनीति में एक बार चुनाव लड़ रहे एक कद्दावर नेता की मौत भी हो चुकी है। ऐसा ही एक किस्सा है 1985 का उस दौरान किशनगढ़ से कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ रहे केसरीचंद चौधरी की चुनाव प्रचार के दौरान मौत हो गई थी। इसके बाद वहां चुनाव स्थगित करने पड़े।

1980 में कस्तुरचंद चौधरी किशनगढ़ से विधायक थे। उनकी गिनती प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में हुआ करती थी। तत्कालीन सरकार में उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा भी प्राप्त था। 1985 में कांग्रेस ने कस्तुर चंद चौधरी को फिर से टिकिट दिया।

चौधरी दिन रात चुनाव प्रचार में जुट गए। उनके पुत्र डॉ. के. सी. चौधरी ने बताया कि उनके पिता कस्तुरचंद चौधरी चुनाव के कुछ दिन पहले दिन पहले वे कई गांवों में जनसंपर्क करने के बाद सलेमाबाद में श्रीजी महाराज का आशीर्वाद लेने पहुंचे। श्रीजी का आशीर्वाद लेकर वापस किशनगढ़ आने के दौरान रात्रि में रास्ते में उनकी तबियत खराब हुई और मृत्यु हो गई। इसके चलते किशनगढ़ में चुनाव टाल दिए गए थे।

मंत्री पद के थे प्रबल दावेदार
उनके निधन से कार्यकर्ताओं में निराशा थी। बाद में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी। क्योंकि उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था ही केन्द्रीय नेतृत्व और राज्य सरकार में उनकी पैठ थी। इसके चलते लोग मंत्रीमंडल में उनकी जगह पक्की मान रहे थे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

नौकरी त्यागपत्र देकर लड़ा चुनाव
तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी ने उनके बड़े पुत्र डॉ. के. सी. चौधरी को किशनगढ़ से चुनाव लडऩे को कहा। डॉ. चौधरी उस समय ब्यावर के अमृतकौर अस्पताल में नाक, कान, गला चिकित्सक रूप में कार्यरत थे। डॉ. चौधरी ने बताया कि उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था कि चुनाव लड़ूंगा। बाद में चुनाव लडऩे के लिए उन्होंने तत्काल इस्तीफा दिया।

कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा। इस दौरान सरकार की ओर से कई मंत्रियों ने चुनाव में मोर्चा संभाला। लेकिन चुनाव में डॉ. चौधरी को हार का सामना करना पड़ा। किशनगढ़ से भाजपा के जगजीत सिंह विधानसभा पहुंचे। हालांकि बाद में 1998 में डॉ. चौधरी ने फिर कांग्रेस से चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंचे।