चांद और मंगल ग्रह पर बसाएंगे ये कॉलोनी, तैयार कर रहे हैं खास स्पेस शटल

चांद और मंगल ग्रह पर बसाएंगे ये कॉलोनी, तैयार कर रहे हैं खास स्पेस शटल

raktim tiwari | Publish: Sep, 02 2018 05:13:00 PM (IST) Ajmer, Rajasthan, India

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सुरेश लालवानी/अजमेर।

लो जी मिल गया मुद्दा। मुझे होजमालो कॉलम लिखने का और सिंधी समाज को थोड़ी बहुत एकजुटता दिखाने का। मामला ताजा ताजा ही है। सिंधी समाज के अनेक संगठन भी इस मुद्दे को लेकर काफी गंभीर नजर आ रहे हैं। यह जुदा बात है कि अलग अलग संगठन अपने अपने कार्यालय में बैठकर ही इसपर अखबारी रोष जाहिर कर रहे हैं। सुना है कि सिंधुपति महाराजा दाहरसेन और शहीद हेमू कालाणी के नाम से प्रस्तावित कॉलोनियों की फाइल बंद की जा रही है। हालांकि कई बरस बीत गए यह कॉलोनियां कभी अस्तित्व में आई ही नहीं बस एक बार फाइल चली और वह फाइल समय के साथ अनगिनत फाइलों में दबकर रह गई।

सिंधी समाज की एक शानदार आदत है। किसी भी बड़े और गंभीर मुद्दे पर इनमें पहिंजो छा इसमें अपना क्या जाता है का एक छोटा वाक्य बोलकर उसे नजरअंदाज कर लिया जाता है। मेरी नजर में सिंधी समाज के बहुत कम समय में आत्मनिर्भर बनने और संपन्नता हासिल करने के पीछे यह नजरिया काफी हद तक उपयोगी साबित हुआ है। लेकिन कई मर्तबा यह आदत खीज भी पैदा करती है। पड़ौस में ही कोई विवाद हो जाए, कुछ असामाजिक तत्व गुंडागर्दी पर उतर आए और उस परिवार को पड़ौसियों की मदद की जरुरत महसूस हो तब भी खिड़कियों से चुपचाप झांक रहे लोग विरासत में मिले इस वाक्य पहिंजो छा थो वजे का आलाप रटते मदद करने बाहर नहीं निकलते। हालांकि कई जगह इसके अपवाद भी है आप ज्यादा भावुक मत होइए।

नाम में क्या रखा है...
खैर, वापिस मूल मुद्दे पर लौटते हैं। सिंधी समाज से जुड़ी दो प्रस्तावित कॉलोनियों को लेकर समाज के अनेक संगठन रणनीति तय कर रहे हैं। किसी मुद्दे को लेकर सिंधी समाज के अधिकांश लोग एकमत हो रहे है यह अच्छी बात है। अंग्रेजी विद्वान शेक्सपीयर का पुराना जुमला है कि नाम में क्या रखा है हालांकि दुनिया के अधिकांश विवाद नाम से शुरु होते है और नाक का सवाल बनते बनते गंभीर रुप धारण कर लेते हैं। वैसे तो अजमेर में किसी भी कॉलोनी का कोई भी नाम रख लीजिए लेकिन सिंधियों के बिना न तो वह कॉलोनी आबाद होगी और न ही विकसित होगी। कितना भी दूर कॉलोनी काट लीजिए जनाब, पहला प्लॉट खरीदने वाला और वहां मकान बनाने वाला सिंधी ही होगा। मुझे तो लगता है कि चांद, मंगल या किसी भी ग्रह पर अगर भूखण्ड खरीदना बेचना संभव होगा तो गारंटी है कि वहां पहला भूखण्ड खरीदने वाला व्यक्ति और प्लॉट बेचने वाला दलाल माफ करना मेरे कहने का मतलब है प्रापर्टी डीलर सिंधी होगा। अब आम भाषा में तो प्रापर्टी डीलर को अपन दलाल ही बोलते हैं भाई। नाराज क्यों होते हो।

सिंधियों ने बसाई कई कॉलोनी

जैसा कि ऊपर जिक्र किया है कि कोई भी कॉलोनी सिंधियों के बिना आबाद नहीं हो सकती। अजमेर में ऐसी सैकड़ों कॉलोनियों है जो सही मायने में सिंधियों ने ही बसाई। इसी शहर में अनेक निजी कॉलोनियों ऐसी है जहां गैर सिंधी को प्लॉट बेचना अघोषित रुप से मनाही है। इन कॉलोनियों के नाम भी हमारे सिंधी भाईयों ने ही तय किए है। सर्वाधिक नाम इष्ट देव झूलेलाल के नाम पर है उसके बाद संत कंवरराम के नाम पर भी कुछ कॉलोनियां बसी। खैर हिंदू देवी देवताओं और संत महात्माओं के नाम पर भी ऐसी अनेक कॉलोनियां है जहां अधिकांश घर सिंधी परिवारों के हैं। एक कॉलोनी का नामरकण बाबा आसाराम के नाम पर भी हुआ। दुर्भाग्य से सिंध के गौरव महाराजा दाहरसेन और शहीद हेमू कालाणी के नाम पर किसी कॉलोनी का नामकरण मेरी नजर में नहीं आया। नगर सुधार न्यास ने यह पहल जरुर की हालांकि अब इन कॉलोनियों के अस्तीत्व में आने पर भी संकट खड़ा हो गया है। देखते है सिंधी समाज की मुहिम क्या रंग लाती है। अजमेर उत्तर से विधायक वासुदेव देवनानी शिक्षा राज्य मंत्री है। खास बात यह भी है कि स्वायत्त शासन विभाग के मंत्री भी अपने सिंधी भाई श्रीचंद कृपलानी है। उनका तो ससुराल भी अजमेर में है। बस जरुरत है जोर लगाके हैंशा।

आओ थदड़ी मनाएं
मैं यह कॉलम लिखने की तैयारी कर रहा हूं कमोबेश उसी समय देश के लाखों सिंधी परिवारों की महिलाएं रविवार को होने वाली बड़ी थदड़ी मनाने की भी तैयारी कर रही है लिहाजा इस कॉलम में थोड़ा बहुत जिक्र तो सिंधियों के इस त्यौहार का बनता है। पिछले कॉलम में मैने लिखा था कि समय के बदलाव के साथ थदड़ी भी औपरिचारिक रुप से मनाई जा रही है। बात करते है पुराने जमाने की। वाह एक दिन पूर्व क्या तो व्यंजन बनते थे। लगता था कि त्यौहार कल नहीं आज ही मनाया जा रहा है। अनेकानेक व्यंजन महज घर पर खाने के लिए नहीं बल्कि रिश्तेदारों, पड़ौसियों को भी वितरित करने के लिए बनाए जाते थे। बेचारी घर की महिलाएं सुबह से रात तक बस इसी काम में व्यस्त रहती थी। और हां, मेरी उम्र के लोगों को तो आज भी याद होगा। स्कूल से घर आते ही एक दो रोटी ठूंसी और लोहे के डिब्बे में आटा शक्कर घी लेकर सीधे नानकत्ताई बनाने के लिए बेकरी पर । हे भगवान बेकरी के बाहर दोपहर होते होते आधा किलोमीटर लंबी लाइन लग जाती थी। डिब्बे के साथ नंबर आते आते रात भी हो जाया करती थी लेकिन मजा भी तो बहुत आता था। एक हफ्ते तक मीठी मानी और नानकताई खाई जाती थी। अब गया वो जमाना।

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