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जानिए थदड़ी के बारे में… सिंधी करते हैं पूजन, बनता है खास ठंडा खना

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sindhi festival

sindhi festival

सुरेश लालवानी/अजमेर.

गोगड़ो, नंदी थदड़ी, वद्ी थदड़ी, टीजड़ी आप सिंधी है तो इन नामों से अच्छी तरह वाकिफ होंंगे। वाकिफ क्या आपकी मर्जी हो या नहीं आपको इनका हिस्सा बनना ही पड़ता है। चलिए यह तो जानते है नां कि यह सब सिंधी समाज के बड़े ही महत्वपूर्ण धार्मिक त्यौहार है। इनमें से टीजड़ी को छोड़कर शेष तीनों धार्मिक त्यौहार इसी महीने मनाए जाते है। पिछले कॉलम में मैनें सिंधु स्मृति दिवस, चालीहो महोत्सव और दाहरसेन जयंती का भी जिक्र किया था। क्या यह अजीब संयोग नहीं है कि यह सभी कार्यक्रम और त्यौहार एक ही महीने मेंआते हैं।
बात करते हैं थदड़ी की। थदड़ी एक तरह से सिंधी समाज की शीतला सप्तमी है। कमोबेश गोगड़ो, नंडी छोटी थदड़ी और वद्ी बड़ी थदड़ी को मनाने की रस्में लगभग एक जैसी ही है। एक दिन पहले रात को मिठी मानी (सिंधी नाम लोलो ) खट्टा भत सहित अनेक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। अगले दिन चूल्हा अब (गैस) जलाना मना है।

आपको एक दिन पहले तैयार खाद्य सामग्री ही खानी होगी। पुराने जमाने में धार्मिक रिवाजों और रस्मों में जीने वाली पीढ़ी तो इन त्यौहारों को बड़ी शिद्दत के साथ मनाती आ रही थी लेकिन अब मौजूदा पढ़ी लिखी मार्डर्न जमाने की नई पीढ़ी इस तरह के रिवाजों से इत्तेफाक नहीं रखती।

इन त्यौहारों को मनाने का तरीका भी पीढ़ी दर पीढ़ी बदलता जा रहा है। मीठी रोटी बनाने का तरीका नई पीढ़ी की सिंधी युवतियों को तो मालूम ही नहीं है। अब जिस जमाने में खुद के हाथ से साधारण रोटी सब्जी बनाना भी दकियानूसी मानी जाती है वहां इस तरह की पेचीदा और मेहनत वाली मीठी रोटी बनाने की कल्पना भी कैसे करें।

अमूमन प्रत्येक समाज में धार्मिक रिवाजों की जिम्मेदारी महिलाएं ओढ़ लेती है। पुरुषों को इस तरह की रस्मों से अलग ही मान लिया जाता है। अब चूुकि पूराने जमाने में कमाने का जिम्मा पुरुषों के पास और घर की जिम्मेदारी महिलाओं के पास थी तो इस तरह के धार्मिक त्यौहार भी उसी अंदाज में मना लिए जाते थे। सिंधी समाज भी इससे अछूता नहीं है। जब तक संयुक्त परिवार थे तब तक घर की खुर्राट बड़ी-बूढ़ी महिलाएं घर की बेटियों में भी जबरदस्ती संस्कार डाल ही देती थी लेकिन अब जमाना एकल परिवार का है।

ऐसे में इस तरह के रिवाज खामखां मान लिए जाते हैं। हालांकि इसका शार्टकट भी निकाल लिया गया है। मीठी रोटी घर पर नहीं बनती तो सिंधी हलवाई की दुकानों पर रेडीमेड मिल जाती है। पैसे की कमी तो है नहीं, बस खरीदिए और पूजा पाठ करके त्यौहार की औपचारिकता पूरी कर लीजिए। इस तरह के त्यौहार मनाने में शिथिलता पुरुषों की वजह से भी आई है।

जैसा कि ऊपर ही इस बात का जिक्र किया था कि धार्मिक रस्मों की जिम्मेदारी महिलाएं ही बखूबी निभा पाती है। एक दिन पहले बना खाना तो पुरानी पीढ़ी के पुरुष सदस्य भी अनचाहे मन से खाते थे। उनके लिए तो बाजार की कचौड़ी पकौड़ी आसानी से उपलब्ध थी। ऐसे में मौजूदा नौजवान पीढ़ी से तो उम्मीद ही क्या हो सकती है। वह भी उस स्थिति में जब बाजार में अनगिनत रेस्तरां, फास्ट फूड और नामी गिरामी पीजा पाइंट दिन भर खुश्बू बिखेरते रहते हैं।

अब अंत में एक मजेदार स्थिति से वाकिफ कराता हूं। जिन घरों में बेचारी बूढ़ी और बीमार सास मौजूद है वहां अगर थदड़ी जैसी परिवार के सदस्यों की लंबी उम्र और खुशहाली से संबंधित धार्मिक रस्म को नजरअंदाज किया जाए तो बड़ी विकट स्थिति पैदा हो जाती है। शुरु से ही धार्मिक मान्यताओं और आस्था में जी रही ऐसे महिलाओ का अपनी बहु पर तो बस चलता नही है लेकिन किसी अनिष्ट की आशंका से थदड़ी के दिन उनका ब्लड प्रेशर डाउन और शूगर लेवल हाई होता रहता है।

अब बेचारी बहू को भी क्या दोष दें। मायके से मीठी रोटी बनाने का हुनर और पूजा पाठ का तरीका मिला नहीं। जिन्हें यह सब आता है उन्हें भी दिन भर नौकरी अथवा अपने काम से लौटकर इस तरह की मेहनत वाले व्यंजन बनाने की हिम्मत नहीं बचती। और वह भी किसके लिए। पति और बेटा- बेटी को खाने में सौ नखरे दिखाएंगे। अगले दिन मजबूरन ही सही चूल्हा तो जलना ही है फिर काहे की माथापच्ची।

मायके मे ही मिलने चाहिए संस्कार
इस तरह की परम्पराओं को निभाने की जिम्मेदारी घर की बहूओं की होती है। लेकिन संस्कार तो मायके से ही आएंगे। हालात और प्राथमिकताएं बदल चुकी है। बेटियां सिर्फ खाना बनाने या घर का काम करने के लिए नहीं है। लड़कियां नौकरी के साथ व्यवसाय मे भी सक्रिय है। फिर भी मेरा मानना है कि इस तरह के धार्मिक रस्मो-रिवाज के संस्कार मायके से ही शुरु हो तो आने वाली नई पीढ़ी को भी मिलेंगे।

मौली लालवानी।