6 फ़रवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पिछले जन्म की सेवा का फल, पढ़िए ये कहानी

सेवा का फल एक न एक दिन जरूर मिलता है। सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। चाहे ज्यादा की गई हो चाहे थोड़ी।

less than 1 minute read
Google source verification
Golden temple

Golden temple

चौथे पातशाह श्री गुरु रामदास जी महाराज के समय अमृतसर श्री हरि मंदिर साहब जी की सेवा चल रही थी। उस वक्त बहुत संगत सेवा कर रही थी, उस सेवा में उसमें उस समय का राजा भी सेवा के लिए आता था। गुरु साहिबान उस राजा को देख कर मुस्कुराते थे। ऐसा तीन-चार दिन होता रहा।

एक दिन राजा ने गुरु साहिबान से पूछा : हे सच्चे पातशाह ! आप हर रोज मुझे देख कर मुस्कुराते क्यों हैं?
तब गुरु साहिबान ने बङे प्यार से राजा की तरफ देखा और उन्हें एक छोटी सी साखी सुनाई।

हे राजन ! बहुत समय पहले की बात है कि एक दिन संगत इसी तरह सेवा कर रही थी, पर उस सेवा में कुछ दिहाड़ी मजदूर भी थे। संगत सेवा भावना से सेवा कर रही थी। शाम को गुरु साहिबान, उन सारी संगत को दर्शन देते थे। एक दिन उस दिहाड़ी मजदूर ने सोचा कि क्यों न मैं भी बिना दिहाड़ी के आज सेवा करूं। उसने यह बात अपने परिवार से की। परिवार ने कहा कोई बात नहीं, आप सेवा में जाओ, एक दिन हम दिहाड़ी नहीं लेंगे। भूखे रह लेंगे, लेकिन एक दिन हम सेवा को जरूर देंगे।

यह साखी सुना कर गुरु साहिबान चुप कर गए, राजा सोच में में पड़ गया,और हाथ जोड़कर गुरु साहिबान से प्रार्थना की : हे सच्चे पातशाह ! लेकिन आप मुझे देख कर मुस्कुराते हैं, इसका क्या राज है?
गुरु साहिबान ने फिर मुस्कुराते हुए, उसको जवाब दिया:व हे राजन ! पिछले जन्म में वो मजदूर तुम थे।

सीख

सेवा का फल एक न एक दिन जरूर मिलता है। सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। चाहे ज्यादा की गई हो चाहे थोड़ी।

प्रस्तुतिः शुभम सोनी