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8 जनवरी, 1877 को स्थापित एमएओ कॉलेज ही अब AMU, पढ़िए पूरी कहानी

एमएओ कॉलेज की स्थापना देश के इतिहास में एक क्रान्ति साबित हुई। देश का पहला आवासीय कॉलेज था। 1920 में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।
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अलीगढ़

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Bhanu Pratap Singh

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Updated: 8 Jan 2018, 8:59 AM IST

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय इस समय न केवल देश बल्कि विश्व में एक प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थान है, जिसकी नींव मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज के रूप में देश के महान शिक्षा क्रान्तिकारी तथा समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान द्वारा डाली गई थी। सर सैयद अहमद खान 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के विफल होने के परिणाम स्वरूप हिन्दुस्तानियों विशेष रूप से मुसलमानों के शैक्षिक सशक्तिकरण के प्रति चिन्तित रहते थे। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला था कि केवल आधुनिक अंग्रेजी एवं विज्ञान की शिक्षा के द्वारा की मुसलमान प्रगति पथ पर आगे बढ़ सकते हैं। मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज) की स्थापना से पूर्व सर सैयद ने इग्लैण्ड भ्रमण किया तथा वहाँ कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्ययों के संचालन को करीब से देखा। उन्होंने भारत में भी मुसलमानों को शिक्षित करने के लिए कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड के तर्ज पर एक विश्वविद्यालय का सपना देखा। उसी सपने को साकार करने के लिए सर सैयद ने 8 जनवरी, 1877 में एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना की।

मुख्य उद्देश्य मुसलमानों को उनकी दयनीय दशा से निकालना

विदित हो कि सर सैयद ने एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थपना मुसलमानों के लिए अवश्य की थी परन्तु उन्होंने इसके द्वारा प्रत्येक धर्म और जाति के लोगों के लिए खुले रखे थे। 03 फरवरी 1884 को लाहौर में दिए गए एक भाषण में सर सैयद ने कहा ‘‘मुझे अफसोस होगा यदि कोई यह समझता है कि मैंने एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना केवल मुसलमानों के लिए की है, जो कि मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच भेदभाव होगा। इस शैक्षिक संस्थान की स्थापना का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों को उनकी दयनीय दशा से निकालना है और मुझे विश्वास है कि आप सब सहमत होंगे कि मुसलमानों की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। उनकी धार्मिक अन्धता ने उन्हें विज्ञान की शिक्षा से दूर रखा और वे सरकार द्वारा स्थापित स्कूलों और कॉलेजों का लाभ उठाने से वंचित रहे और इसलिए यह आवश्यक हो गया कि उनके लिए शिक्षा के विशेष प्रबन्ध किए जाए। उन्होंने कहा कि कॉलेज में हिन्दू और मुसलमानों दोनों को बराबर की तथा बिना भेदभाव की शिक्षा प्रदान की जाए। दोनों में कोई भी भेदभाव नहीं होगा।’’ सर सैयद का उक्त भाषण एम॰ए॰ओ॰ काॅलेज के पूरे दर्शन को उजागर करता है और आज भी अमुवि के दरवाजें प्रत्येक धर्म जाति और क्षेत्र के छात्र-छात्राओं के लिए खुले हैं।

छात्रों के लिए प्रभावी जीवन शैली लागू की

सर सैयद ने एम॰ए॰ओ॰ काॅलेज को केवल परम्परागत शैक्षिक संस्थान नहीं बनाया। देश में पहली बार उन्होंने आवासीय शिक्षा पद्धति की नींव डाली और एम॰ए॰ओ॰ काॅलेज देश का प्रथम आवासीय शैक्षिक संस्थान था। आवासीय शिक्षा के बारे में कई भ्रान्तियों को दरकिनार करते हुए सर सैयद ने कहा ’’अक्सर लोग प्रश्न करते है कि छात्रों को किस प्रकार छात्रावासों मे पूर्ण रूप से शिक्षित किया जायेगा। जिस प्रकार कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड में छात्र नियमित रूप से चर्च जाते है, उसी प्रकार यहाँ भी छात्रों को नियमित रूप से मस्जिद में नमाज़ में जाना होगा। सभी छात्रों की एक ड्रेस होगी ताकि वे अन्य विद्यालयों के छात्रों से अलग नज़र आए। प्रत्येक गतिविधि का एक निश्चित समय होगा चाहे वह पठन-पाठन का हो अथवा भोजन का। इसी प्रकार कॉलेज में खेलकूद का भी इन्तजाम होगा और हर छात्र को स्वतन्त्रता होगी कि वह अपनी रुचि के अनुसार खेलकूद मे भाग ले। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सर सैयद ने एक प्रभावी जीवनशैली छात्रों के लिए लागू की। 1- (तहजीब-उल-अख्लाक, 01 रजब 1289, हि)

विज्ञान शिक्षा पर जोर

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सर सैयद की शिक्षा नीति केवल कर्मचारी पैदा करना नहीं थी, बल्कि जिम्मेदार नागरिक पैदा करनी थी। उनकी मुख्य उद्देश्य शिक्षा के साथ मुस्ल्मि समाज सुधार भी था। एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना का उद्देश्य भी केवल शिक्षा प्रदान करना नहीं बल्कि एक स्वावलम्बी मुस्लिम समाज की संरचना थी। सर सैयद मुसलमानों में व्याप्त कुरीतियों के विरूद्ध थे और मानसिक स्वतन्त्रता के पक्षधर भी और इसीलिए वे धार्मिक अन्धता के भी खिलाफ थे। उन्होंने विवाह समारोहों में अनावश्क खर्चों को विरोध किया तथा उन परम्पराओं का भी विरोध किया जो इस्लाम का भाग नहीं थी परन्तु भारतीय मुसलामान उन्हें मानते थे। सर सैयद न केवल एक शैक्षिक क्रान्तिकारी और प्रभावी झलक एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज के संचालन में साफ प्रतीत होती है। उन्होंने कहा था, ’’ एम॰ए॰ओ॰ काॅलेज छात्र विश्व के प्रत्येक कोने में जायेंगे और स्वतन्त्र चिन्नत, खुला हृदय तथा मानवता का सन्देश देंगे। सर सैयद तकनीकी तथा विज्ञान शिक्षा पर सर्वाधिक जोर दिया जो बदलते युग की आवश्यकता थी। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा ‘‘मुझे आप किसी भी नाम से पुकारें परन्तु अपने बच्चे पर दया करें। उनके लिए कुछ सकारात्मक करें (अर्थात स्कूल भेजें) ताकि आप को शर्मिन्दा न होना पड़े’’ सर सैयद का मत था कि, ’’यदि हम विज्ञान में प्रगति नहीं करते तो हम सदैव पिछड़े रहेंगे और हमें अन्धविश्वासों से बाहर आना होगा क्योंकि अन्धविश्वास धर्म का भाग नहीं है।

1920 में बना विश्वविद्यालय

एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना के लिए सर सैयद ने फन्ड जमा करना आरम्भ किया। उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों से कॉलेज के लिय चन्दा देने की अपील की जिनमें इग्लैण्ड की महारानी भी शामिल थी। सर सैयद के साथ-साथ उनके मित्र मौलवी समीउल्ला ने भी एम॰ए॰ओ॰ काॅलेज की स्थापना में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज देश और मुसलमानों के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने आधुनिकता से मुसलमानों का परिचय कराया। केवल यही नहीं एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना ने मुसलमानों की सदियों पुरानी बेड़ियों को तोड़ने में भी सकारात्मक भूमिका अदा की। आरम्भ में एम॰ए॰ओ॰ काॅलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बन्धित था परन्तु 1885 में उसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कर दिया गया। 1920 में संसद के कानून द्वारा एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप मे उच्चीकृत किया गया, जो कि कालान्तर मे मुसलमानों के बौद्धिक केन्द्र के रूप मे विकसित हुआ आज भी देश की सेवा कर रहा है।

सर सैयद का सपना साकार करें

एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज की स्थापना सर सैयद का एक एैसा कदम है जिसने न केवल मुसलमानों की आार्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दशा बदली बल्कि विश्व स्तर पर अपनी छाप छोड़ी। आज अमुवि के छात्र छात्रायें विश्व के कोने कोने मे फैले हुए हैं और न केवल अमुवि के तराने ‘‘जो अब्र यहाँ से उठेगा वह सारे जहाँ पर बरसेगा’’ को चरितार्थ कर रहे है बल्कि सर सैयद के उस कथन को भी प्रमाणित कर रहे हैं कि, ’’यहाँ के छात्र विश्व के कोने कोने में जायेंगे और विज्ञान तथा आपसी प्रेम एवं सदभाव का सन्देश देगें’’। वैश्वीकरण के इस युग में सर सैयद के अनुचायी है जो धार्मिक अन्धता को सिरे से खारिज करता है। आज एम॰ए॰ओ॰ कॉलेज के स्थापना दिवस पर अमुवि बिरादरी को नया संकल्प लेने की आवश्यकता है कि वे सर सैयद के शिक्षा आन्दोलन तथा समाज सुधार को देश के कोने-कोने मे फैलाएंगे ताकि सर सैयद का सपना साकार हो सके।

-डॉ. जसीम मोहम्मद

(लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व मीडिया सलाहकार हैं)