
मकर संक्रांति से कुंभ नगरी में देवता भी करेंगे वास , शुरू हुआ धर्म, आध्यात्म का महापर्व
प्रयागराज। तीर्थराजो जयति प्रयाग सभी तीर्थों के राजा प्रयागराज की जय। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम तट पर बसी महर्षि भारद्वाज की तपोस्थली। कुंभनगरी होने का गौरव हरिद्वार, नासिक और उज्जैन को भी है लेकिन प्रयागराज में हर 12 साल में महाकुंभ, हर छठें वर्ष अर्धकुंभ और हर साल माघमेला लगता है। मकर संक्रांति से महाशिवरात्रि तक चलने वाले इसे मेले के दौरान संगम की रेती पर टेंट का विशाल शहर बसता है। कुंभ के जैसे ही माघ मेले में भी बाकायाद प्रमुख स्नान होते हैं और वर्ष भर त्रिवेणी के तट पर महत्वपूर्ण तिथि और पर्वों पर स्नानार्थियों का रेला लगा रहता है। इन तिथियों और पर्वों में एक महत्वपूर्ण दिन है मकर संक्रांति। प्रयागराज में मंकरसंक्रांति के स्नान का विशेष महत्व है।
तुलसीदास ने भी किया प्रयाग का गुणगान
मकर संक्रांति पर ही सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता है। इस दौरान तीर्थराज प्रयाग में संगम स्नान का फल लाखों गुना ज्यादा बढ़ जाता है। तुलसीदास ने मकरसंक्रांति का वर्णन करते हुए लिखा है...
माघ मकर गति रवि जब होई, तीरथ पतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
पूजहि माधव पद जल जाता, परसि अखय वटु हरषहि गाता॥
(अर्थात - ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य एवं मरुद्गण माघ मास में प्रयागराज के लिए यमुना के संगम पर गमन करते हैं। माघ के महीने में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तब सभी को तीर्थराज प्रयाग में आना चाहिए और स्नान करना चाहिए।)
देशभर से आते हैं कल्पवासी
प्रयागराज में मकर संक्राति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन से एक महीने के माघ मेले का आरंभ होता है। देशभर से आए श्रद्धालु यहां कल्पवास करने आते हैं। संगम तट पर संक्रांति के पर्व पर स्नान, दान, जप का अतिविशेष महत्व है। संक्रांति के दिन दिया हुआ दान पुनर्जन्म होने पर सौ गुना होकर प्राप्त होता है। संक्रांति काल में संगम के तट पर दिया जाने वाला दान होने वाले अनुष्ठान कई जन्मों का फल देता है।
अच्छे दिनों की शुरुआत
मकर संक्रांति से ही अच्छे दिनों यानी शुभ दिनों की शुरुआत हो जाती है। मकर संक्रांति पर संगम के तट पर सिर्फ नदियों के संगम में ही पुण्य की डुबकी नहीं लगती धर्म, ज्ञान, आध्यात्म, समाजसेवा का भी लाभ मिलता है।
विशेष तिथियों पर पुण्य स्नान
जानकारों का कहना है कि प्रयाग की विशेष भौगोलिक स्थिति मकर संक्रांति को विशेष फलदायक बनती है। जिसमें आकाशीय नक्षत्रों से निकलने वाली तरंगों का विशेष प्रभाव केंद्र प्रयाग होता है। जिन-जिन तिथियों में ऐसा होता है उन-उन तिथियों में प्रयाग में विशेष स्नान होता है। इनमें संक्रांति सबसे महत्सवपूर्ण है।
कोटि-कोटि देवाताओं का वास
संगम की रेती पर 33 कोटि देवी देवताओं का आवाहन होता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को युगों के साक्षी अक्षयवट के पुण्य दर्शन का लाभ मिलता है। संगम तट पर मां गंगा की गोद में विराजमान हनुमानजी महाराज के दिव्य दर्शन के साथ ही आदिशक्ति अलोपशंकरी धाम और नागवासुकी महाराज सहित त्रेतायुग से विराजमान बेनी माधव के दर्शन प्राप्त होते हैं। प्रयागराज के चारों दिशाओं में स्थापित 12 माधवों का भी दर्शन श्रद्धालु को मिलता है। कहा जाता है कि संगम स्नान के बाद बारह माधव की परिक्रमा करने से सभी तीर्थों के दर्शन लाभ मिलता है। हिमालय कन्दराओं मठो, मंदिरों से दुर्लभ संतो के दर्शन का सौभाग्य यहीं मिलता है।
Published on:
15 Jan 2020 06:13 am
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