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अलवर: शिशु चिकित्सालय में बदहाली की हद, एक बेड पर 2-3 तीन मासूम; 20 बेड का वार्ड दो साल से बंद

अलवर के राजकीय गीतानंद शिशु चिकित्सालय में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खुल गई है। अस्पताल के सामान्य वार्ड में बेड की भारी कमी के चलते एक बेड पर दो से तीन शिशुओं को भर्ती करने की मजबूरी बनी हुई है।

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अलवर के राजकीय गीतानंद शिशु चिकित्सालय में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खुल गई है। अस्पताल के सामान्य वार्ड में बेड की भारी कमी के चलते एक बेड पर दो से तीन शिशुओं को भर्ती करने की मजबूरी बनी हुई है। उमस, गर्मी और दुर्गंध के बीच जारी इस उपचार ने मरीजों और उनके परिजनों की पीड़ा को दोगुना कर दिया है।

शिशु चिकित्सालय में इन दिनों मरीजों का हाल बेहाल है। इस स्थिति के कारण न तो परिजन ठीक से खड़े हो पा रहे हैं और न ही चिकित्सा स्टाफ शिशुओं की समुचित निगरानी कर पा रहा है। उमस और दुर्गंध के बीच यह 'उपचार' किसी यातना से कम नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर कई परिजन बेड न मिलने के कारण अपने बीमार बच्चों को निजी अस्पतालों में ले जाने को मजबूर हैं, जिससे उन पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

32 बेड पर 50 से अधिक मरीज

अस्पताल के सामान्य वार्ड में आधिकारिक रूप से 22 बेड स्वीकृत हैं, जिनमें 20 बेड अतिरिक्त जोड़कर 42 बेड की व्यवस्था थी। हालांकि, पीडब्ल्यूडी द्वारा 20 बेड वाले जर्जर वार्ड को कंडम घोषित करने के बाद से अब मरीजों को केवल 32 बेड ही मिल पा रहे हैं। जबकि भर्ती होने वाले शिशुओं की संख्या अक्सर 50 के पार पहुंच जाती है। आलम यह है कि शाम होते-होते प्रत्येक बेड पर तीन-तीन बच्चे भर्ती नजर आते हैं।

निर्माण कार्य की कछुआ चाल

अस्पताल के 20 बेड वाले वार्ड और गैलरी को दो साल पहले बंद कर दिया गया था, जो आज भी कबाड़खाने में तब्दील है। चार महीने पहले पुराने वार्ड को तोड़कर नया निर्माण कार्य शुरू करने का दावा किया गया था, लेकिन संबंधित विभाग अब तक केवल पिलर ही खड़े कर पाया है। निर्माण कार्य की इस सुस्त रफ्तार ने मरीजों की मुसीबतें बढ़ा दी हैं।

यदि जल्द ही वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, तो भीषण गर्मी के दौर में मासूमों की स्थिति और भी विकट हो सकती है। प्रशासन की ओर से अब तक इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। बेड की उपलब्धता नहीं होने के कारण बहुत से परिजन रोज परेशानी का सामना कर रहे हैं। बावजूद इसके प्रशासन पूरी तरह से असंवेदनशील बन हुआ है।