
फोटो पत्रिका - हंस सरोवर में भरा पानी और निर्माणाधीन चार्जिंग स्टेशन (इनसेट में)
अलवर में सरकारी अफसरों की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। प्रशासन ने जल संसाधन विभाग की चेतावनी को ताक पर रखकर हंस सरोवर के डूब क्षेत्र (Flood Zone) में इलेक्ट्रिक बसों का चार्जिंग स्टेशन बना दिया है। नदी, नाले, तालाब के डूब व बहाव क्षेत्र में न कोई निजी प्रोजेक्ट लॉन्च किया जा सकता और न सरकारी, लेकिन अलवर प्रशासन ने हंस सरोवर के डूब क्षेत्र में 50 इलेक्ट्रिक बसों के लिए चार्जिंग स्टेशन बना दिया।
हैरत की बात तो ये है कि जल संसाधन खंड ने चार्जिंग स्टेशन निर्माण से पहले नगर विकास न्यास (यूआइटी) को सर्वे की रिपोर्ट दी थी। इसमें इस एरिया को हंस सरोवर का डूब क्षेत्र बताया, बावजूद इसके जमीन चार्जिंग स्टेशन के लिए आवंटित कर दी।
नगर निगम की मॉनिटरिंग में रूडसिको ने यहां चार्जिंग स्टेशन खड़ा कर दिया, जिसका करीब 80 फीसदी काम पूरा हो गया। अब सवाल खड़ा हो गया कि नदी, नाले, सरोवर के डूब एरिया में इतना बड़ा प्रोजेक्ट लॉन्च क्यों किया गया और सर्वे रिपोर्ट आने के बाद भी अफसरों ने आंखों पर पट्टी क्यों बांधी? जल संसाधन खंड की बिना एनओसी के कैसे काम शुरू हो गया? अब इस मामले की जिम्मेदार कौन हैं? जिन पर एक्शन होना है।
प्रधानमंत्री ई-बस योजना के तहत अलग-अलग शहरों में ईवी बसों का संचालन हो रहा है। इसके लिए यूआइटी ने करीब एक साल पहले 10 हजार वर्ग मीटर से अधिक जमीन आवंटित कर दी। इस जमीन का सर्वे जल संसाधन खंड से करवाया गया। पाया कि बहाला की इस जमीन पर हंस सरोवर है और यह जमीन उसका डूब क्षेत्र है। सर्व की रिपोर्ट आते ही प्रशासन के कदम ठहर जाने चाहिए थे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक जल स्रोतों के सहेजने को लेकर गाइडलाइन जारी हो चुकी हैं, जिसका पालन यहां होना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
प्रशासन ने बैठक करके जमीन योजना की मॉनिटरिंग करने वाले नगर निगम को सौंप दी गई और चार्जिंग स्टेशन का निर्माण रूडसिको को दे दिया गया। करीब 80 फीसदी कार्य पर 6 करोड़ रुपए खर्च हो चुके। करीब दो करोड़ रुपए और खर्च होंगे। हालांकि यह भुगतान दिल्ली से सीधा रूडसिको को किया जाना है।
नगर निगम 50 ईवी बसों का संचालन करने के लिए रूट निर्धारित कर चुका है। चार्जिंग स्टेशन का काम जल्द पूरा करने का दबाव है। यहां एक साथ 50 बसों की चार्जिंग होगी। रात को बसें खड़ी होंगी। सुरक्षा से लिए अन्य इंतजाम किए गए, लेकिन तालाब के डूब एरिया में यह बनाए जाने का खुलासा अब हुआ है। कभी अधिक बारिश हुई, तो खतरा बढ़ेगा।
यूआइटी ने पहले सर्वे के बाद दूसरी बार सर्वे करने के लिए जल संसाधन खंड से कहा, लेकिन खंड ने सर्वे नहीं किया। एक अधिकारी का कहना है कि वह दूसरा सर्वे करके यह रिपोर्ट नहीं देना चाहते थे कि यहां डूब एरिया नहीं है। यानि पहले सर्वे की रिपोर्ट ही पर्याप्त थी। बताते हैं कि उन पर दबाव आ रहा था।
यूआइटी को बहाला समेत तीन गांवों की 31 हेक्टेयर जमीन पर आवासीय योजना लॉन्च करनी थी, लेकिन हंस सरोवर का डूब एरिया सर्वे में आने के कारण यूआइटी आगे नहीं बढ़ी। इसी तरह चार्जिंग स्टेशन के लिए भी यूआइटी के कदम रोकने थे। उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट देनी थी और दूसरी जगह स्टेशन के लिए देखनी थी।
राजस्थान में अब्दुल रहमान बनाम राज्य सरकार (2003) जनहित याचिका के बाद दिए गए आदेश में कहा गया है कि राज्य के जलस्रोतों (जैसे नदियों, तालाबों और जोहड़) को अतिक्रमण मुक्त कर उन्हें 15 अगस्त 1947 की मूल स्थिति में बहाल किया जाए। जलस्रोतों का संरक्षण हो। राज्य सरकार और स्थानीय निकायों को प्राकृतिक जलभराव क्षेत्रों, बहाव मार्गों और चरागाह भूमि पर हुए अवैध निर्माण, कब्जों को हटाने के लिए कानूनी आधार मिला।
अवैध आवंटन निरस्त करने के आदेश दिए गए। इससे पहले सरकारी मिलीभगत से तालाबों/नदियों की जमीनों पर जो पट्टे या खातेदारी अधिकार गलत तरीके से जारी किए गए थे, उन्हें निरस्त करने की प्रक्रिया तेज हुई। साथ ही इस फैसले ने सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्देश को पुख्ता किया, जिसमें सभी राज्य सरकारों को ग्राम पंचायत व सार्वजनिक उपयोग की जमीनों को अवैध अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराने की स्थायी योजना बनाने का आदेश दिया गया था।
राजस्थान सरकार ने झीलों और जलस्रोतों के संरक्षण के लिए राजस्थान लेक्स (प्रोटेक्शन एंड डेवलपमेंट) अथॉरिटी एक्ट लागू किया है, इसके तहत जलस्रोत के डूब क्षेत्र या जल भराव क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र माना जाता है। इस क्षेत्र में कोई भी नया निर्माण या प्रोजेक्ट बिना राजस्थान झील विकास प्राधिकरण की पूर्व अनुमति के शुरू नहीं किया जा सकता। प्राधिकरण भी झील के विकास से संबंधित ही कार्यों को करने की अनुमति दे सकती है।
बहाला की इस जमीन का सर्वे जल संसाधन खंड से करवाया था। पहली रिपोर्ट में बताया कि हंस सरोवर का डूब एरिया है। हमने दोबारा सर्वे करके रिपोर्ट मांगी, तो उन्होंने आज तक नहीं दी। इस समय संबंधित जमीन पर कोई पानी नहीं है। खतरा नहीं है - स्नेहल नाना, सचिव, यूआइटी अलवर
हमें चार्जिंग स्टेशन निर्माण की जिम्मेदारी मिली है, जिसका कार्य करीब 80 फीसदी पूरा हो गया है। जमीन की जांच करना हमारे क्षेत्र में नहीं आता - सतीश मीना, एक्सईएन, रूडसिको
अब्दुल रहमान बनाम राज्य सरकार में साफ है कि नदी, नाले, सरोवर के डूब एरिया में अतिक्रमण नहीं हो सकता। जमीन का नेचर नहीं बदल सकते। कोई प्रोजेक्ट भी लॉन्च नहीं किया जा सकता, यदि ऐसा किया जा रहा है, तो हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन है - अशोक कुद्दल, यूआइटी के पूर्व शासकीय अधिवक्ता
यह जमीन यूआइटी की है, लेकिन इस जमीन पर हंस सरोवर है और जहां यह चार्जिंग स्टेशन बन रहा है, वह सरोवर का डूब एरिया है। हमने संबंधित कंपनी को नोटिस भी दिया था - गरिमा सैनी, जेईएन, जल संसाधन खंड
Updated on:
06 Jul 2026 11:52 am
Published on:
06 Jul 2026 11:52 am
