
पेड़ों के पास खड़े रामकिशोर मीणा (फोटो - पत्रिका)
Alwar Chandan Farming: आमतौर पर यह माना जाता है कि चंदन की खेती केवल दक्षिण भारत के राज्यों जैसे कर्नाटक या तमिलनाडु में ही की जा सकती है। राजस्थान की गर्म जलवायु और रेतीली-पथरीली मिट्टी को इसके लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं माना जाता था। लेकिन अलवर शहर के मालवीय नगर के रहने वाले किसान रामकिशोर मीणा ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह से बदल दिया है।
उन्होंने अपने गांव खोहरा मलावली की दो बीघा जमीन में चंदन के पौधे रोपकर कृषि क्षेत्र में एक बेहतरीन और अनोखा नवाचार कर दिखाया है। आज उनके खेत में लहलहाते चंदन के पेड़ न सिर्फ खुशबू बिखेर रहे हैं, बल्कि आने वाले समय में उन्हें लाखों रुपए का मुनाफा देने के लिए भी पूरी तरह तैयार हैं।
रामकिशोर मीणा साल 2023 में अलवर आकाशवाणी केंद्र से सेवानिवृत्त (रिटायर) हुए थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने खाली बैठने के बजाय खेती-बाड़ी में कुछ अलग करने का मन बनाया। इसी दौरान उन्होंने सोशल मीडिया और यूट्यूब पर चंदन की आधुनिक खेती से जुड़े कुछ वीडियो देखे। वीडियो देखने के बाद उनके मन में अलवर में ही चंदन उगाने का विचार आया।
इस विचार को और मजबूती देने के लिए उन्होंने दूरदर्शन पर आने वाले प्रसिद्ध कृषि कार्यक्रम 'कृषि दर्शन' को नियमित रूप से देखना शुरू किया। हालांकि, उनके मन में लगातार यह संशय और डर बना हुआ था कि क्या अलवर की इस मिट्टी और गर्म मौसम में चंदन के पौधे सचमुच जीवित रह पाएंगे या नहीं।
इस संशय को दूर करने के लिए रामकिशोर ने एक बेहद अनोखा और वैज्ञानिक तरीका अपनाया। उसी दौरान अलवर में रहने वाले उनके एक परिचित का ट्रांसफर बेंगलुरु हो गया। रामकिशोर ने अलवर की मिट्टी को प्लास्टिक के कट्टों में भरा और जांच के लिए बेंगलुरु भिजवा दिया। वहां उस मिट्टी में चंदन के कुछ पौधे लगाए गए।
जब कुछ ही सालों में वे पौधे वहां अच्छी तरह से बढ़ने लगे, तो यह पूरी तरह साबित हो गया कि अलवर की मिट्टी में चंदन उगाने की पूरी क्षमता है। इस सफल प्रयोग से उत्साहित होकर रामकिशोर ने तुरंत कर्नाटक से चंदन के 300 पौधे और उनके साथ लगाए जाने वाले कजूनिला (होस्ट) के पौधे मंगवाए। पौधों को लाने और लगाने में उनका करीब 90 हजार रुपए का कुल खर्च आया।
रामकिशोर बताते हैं कि गांव में पानी की भारी किल्लत रहती है, जिसके कारण पारंपरिक फसलों की खेती लगातार कम हो रही है। इसी वजह से उन्होंने चंदन को चुना क्योंकि इसमें पानी की जरूरत बहुत ही कम होती है। चंदन एक परजीवी पौधा है जो अपनी जड़ों से सिर्फ 25 से 30 प्रतिशत खुराक लेता है, जबकि बाकी खुराक के लिए उसे एक सहयोगी पौधे की जरूरत होती है।
इसीलिए उन्होंने चंदन के साथ कजूनिला के पौधे भी लगाए। आज मात्र 22 महीनों में ही ये पौधे 30 से 40 फीट ऊंचे हो चुके हैं। उनके इस अनोखे काम में मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) में कार्यरत बड़े बेटे, दिल्ली पुलिस में तैनात छोटे बेटे और कृषि विभाग के अधिकारी मनोज जैन ने समय-समय पर मार्गदर्शन देकर पूरा सहयोग किया है।
Updated on:
13 Jul 2026 11:53 am
Published on:
13 Jul 2026 11:53 am
