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सिलीसेढ़ झील: वेटलैंड बनने के 6 महीने बाद भी नहीं हटा अतिक्रमण, सर्वे तक अटका

अलवर की खूबसूरत सिलीसेढ़ झील को वेटलैंड घोषित हुए 6 महीने बीत चुके हैं, लेकिन जमीनी हालात जस के तस हैं। प्रशासन, यूआईटी और जल संसाधन विभाग की लापरवाही के चलते यहां नए अतिक्रमणों का सर्वे तक नहीं हो पाया है, जबकि पुराने अवैध कब्जों को हटाने की कार्रवाई भी ठंडे बस्ते में है।

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सिलीसेढ़ झील (फोटो - पत्रिका)

राजस्थान में अलवर की मशहूर सिलीसेढ़ झील को लेकर प्रशासन कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे वेटलैंड (नम भूमि) घोषित हुए आधा साल बीत गया, पर अब तक अतिक्रमण हटाने के लिए संयुक्त सर्वे की शुरुआत भी नहीं हो सकी है। नियम के मुताबिक, एसडीएम अलवर कार्यालय, यूआईटी (UIT) और जल संसाधन विभाग को मिलकर झील क्षेत्र में हुए अवैध निर्माणों की पहचान करनी थी, लेकिन यह योजना सिर्फ फाइलों में दबी हुई है।

दो बार सर्वे किया

ऐसा नहीं है कि प्रशासन को अतिक्रमण की जानकारी नहीं है। करीब डेढ़ साल पहले प्रशासन, यूआईटी, जल संसाधन विभाग और सरिस्का की टीम ने मिलकर दो बार सर्वे किया था। उस दौरान कई अवैध निर्माणों को चिन्हित भी किया गया था। इसके बाद झील को वेटलैंड का दर्जा तो मिल गया और विभाग ने इसके कायाकल्प के लिए 18 करोड़ रुपये का बजट प्रस्ताव भी सरकार को भेजा, लेकिन उस बजट को अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।

अधिकारियों का कहना है कि विकास कार्य शुरू होने से पहले अतिक्रमण हटाना पहली शर्त है, मगर हकीकत यह है कि पुरानी कार्रवाई के बाद आगे की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

होटल और रेस्टोरेंट बढ़ा रहे हैं मुश्किल

सिलीसेढ़ झील के आसपास और कैचमेंट एरिया में धड़ल्ले से होटल, रेस्टोरेंट और पक्के निर्माण खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों और रसूखदारों की ओर से किए गए इस अतिक्रमण की वजह से झील के आसपास की जमीन की नमी लगातार कम हो रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह नमी ही वेटलैंड की जान होती है, क्योंकि नम इलाकों में ही विदेशी और स्थानीय पक्षी सबसे ज्यादा आते हैं। अतिक्रमण की वजह से इन बेजुबान पक्षियों का आशियाना खतरे में पड़ गया है।

अतिक्रमण हटाना क्यों है जरूरी?

झील से अवैध कब्जे हटाना सिर्फ कानूनी मजबूरी नहीं, बल्कि अलवर को पर्यावरण संकट से बचाने के लिए भी बेहद जरूरी है।
बाढ़ का खतरा: वेटलैंड्स प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करते हैं। जब भारी बारिश होती है, तो ये अतिरिक्त पानी को सोख लेते हैं। अगर यहां अतिक्रमण रहेगा, तो बारिश का पानी रिहायशी इलाकों में घुसेगा, जिससे बाढ़ के हालात बन जाएंगे। सिलीसेढ़ में 'ऊपरा' (पानी का तेज बहाव) भी चलती है, जो रुकावट आने पर खतरनाक हो सकती है।
जहरीला हो रहा है पानी: झील के आसपास हो रहे अवैध निर्माणों और होटलों का कचरा सीधे पानी में मिल रहा है। यह वेटलैंड किसी समय प्राकृतिक फिल्टर का काम करते थे, लेकिन अब कचरे के कारण पानी जहरीला हो रहा है, जिससे भूमिगत जल (Groundwater) भी दूषित हो रहा है।
खतरे में जीव-जंतु: सिलीसेढ़ झील कई दुर्लभ प्रजातियों के पक्षियों, मछलियों और पौधों का घर है। इंसानी दखल और अतिक्रमण के कारण इनका प्राकृतिक आवास पूरी तरह नष्ट हो रहा है, जिससे कई प्रजातियां यहां से गायब होने की कगार पर हैं।

अगर प्रशासन ने जल्द ही सख्त कदम उठाकर सिलीसेढ़ को इन अवैध कब्जों से मुक्त नहीं कराया, तो अलवर अपनी इस ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर को हमेशा के लिए खो देगा।

सिलीसेढ़ झील व कैनाल के आसपास के अतिक्रमण पर नियमों के तहत कार्रवाई करेंगे - शेर सिंह वर्मा, एक्सईएन, जल संसाधन खंड