
पूरे देश के लिए मिसाल है अलवर की यह पंच, गांव में की ऐसी पहल, हर कोई कर रहा सेल्यूट
अलवर. अलवर शहर से सटा हुआ है गांव बेलाका। गावं में न जाने कब से मृत्यु भोज की परंपरा है। रसूखदारों के लिए तो यह हैसियत दिखाने का मौका होता था लेकिन जिन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती थी उनके लिए भी यह जरूरी था। जो नहीं कर सकता था उसे मजबूरन करना पड़ता था। असल में यह एक मौत के बाद पूरे परिवार की आर्थिक मौत जैसा हो जाता था।
ऐसे ंमे बेलाका की पंच बबीता ने एक पहल की और लोगों को जबरन मृत्यु भोज नहीं करने के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया। एक दशक के प्रयास के बाद इन्हें सफलता भी मिली और गांव वालों ने अब माना कि जबरन किसी के दवाब में वो मृत्यु भोज नहीं करेंगे। गांव में कई बुजुर्गों की मौत के बाद भी कई गांवों को भोजन खिलाने की मृत्यु भोज की परम्परा यहां मिट गई है।
बबीता की पीड़ा ने पहल को बढ़ाया
ग्रामीणों में परिवर्तन की यह बयार इस गांव की पंच 36 वर्षीया महिला बबीता लाई हैं। आठवीं कक्षा तक पढ़ी-लिखी बबीता के ससुर का 2005 में देहांत हो गया था। इस समय इनके परिवार जनों ने कई गांवों को भोज किया। इस भोज में एक लाख रुपए से अधिक का खर्चा आया जिसमें इनके हिस्से में 30 हजार रुपए आए। इनके पति रामलाल मजदूरी करते हैं। गरीबी में रहकर इन्होंने ब्याज पर पैसे लेकर ससुर की मौत पर मृत्यु भोज किया। यह पीड़ा इनके मन में थी, इस दौरान ये इब्तिदा के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी तो इनका एक ग्रुप तैयार हुआ। इन्हें जहां भी मौका मिलता तो बस यह तो मृत्यु भोज के खिलाफ आवाज उठाती। इसका परिणाम यह हुआ कि गांव में माहौल बन गया। ये जब चार साल पहले पंच बनी तो इनके जेठ की मृत्यु होने पर इन्होंने अपने पति को पक्ष में लेकर इन्होंने मृत्यु भोज नहीं करने की बात कही। इनके परिवार वालो ं ने इनकी बात मान ली। यहां की जाटव बस्ती में यह पहला मौका था जब किसी की मृत्यु पर भोज नहीं हो रहा था। यहां के सरपंच अशोक कुमार की दादीजी का निधन हो गया तो उन्होंने भी मृत्यु भोज नहीं करने की घोषणा कर दी। इससे यही गांव ही नहीं कई गांवों में इनके समाज में तो हडक़म्प सा मच गया। इस पहल का विरोध हुआ लेकिन इसे बाद में स्वीकार कर लिया गया। इस गांव में अधिकतर महिलाएं पंच बबीता के पक्ष में आकर खड़ी हो गई जिन्होंने कहा कि वे गांव में होने वाले मृत्यु भोज में खाना खाने ही नहीं जाएंगी। महिलाओं के इस बहिष्कार के निर्णय के बाद बीते एक वर्ष में यहां के लोग मृत्यु भोज नहीं कर रहे हैं। इसके बाद यहां कई बुजुर्गों की मौत हुई लेकिन इनमें कई गांवों को होने वाला भोज बंद हो गया। बबीता को इस जीत में एक दशक से अधिक का समय लगा।
अब 500 घरों की बस्ती वाला बेलाका गांव सहित समीपवर्ती गांव पालका व झोपड़ी में भी इसका प्रभाव पड़ा है जहां भी मृत्यु भोज करने से लोग इनकार करने लगे हैं। इस परिवर्तन से पहले बबीता का लंबा संघर्ष है जो गांव तथा समीपवर्ती गांवों में किसी की मौत पर उन्हें मृत्यु भोज नहीं करने की प्रेरणा देती है। इस कुप्रथा के साथ सवा महीने तक पुरुषों का काम पर नहीं जाने का रिवाज भी बंद हो गया है।
पेट पर पट्टी बांधकर, साग सत्तू से गुजारा करते हुए, बच्चों के मुख में जाने वाले दूध की बूंदें बचाकर कौड़ी-कौड़ी धन जोड़ा जाए और कुरीतियों को तृप्त किया जाए। उसने देखा कि लोग घर के बर्तन भांडे बेचकर, जमीन गिरवी रखकर, मित्र-रिश्तेदारों से कर्जा लेकर मृत्युभोज करते हैं। बाद में अपनी सीमित आमदनी में रोज जलील होकर ब्याज के दुष्चक्र में फस जाते। बबीता ने खुद ये पीड़ा झेली। फिर संकल्प किया कि अब गांव में ये जलालत और किसी को सहन नहीं करने देगी। प्रयास किया, खुद जगी और गांव के लोगों को भी जगाया। अब बदलाव शुरू हो गया है। सब लोग मन से इसकी तारीफ भी कर रहे हैं। अब इसका असर आस-पास के गांव-ढाणियों में भी हो जाए बस सबके यही प्रयास हैं।
सरपंच ने खुद दिखाई हिम्मत
पंच बबीता जाटव की पहल से प्रेरित होकर स्थानीय सरपंच जगदीश कुमार ने खुद के परिवार में दादीजी की मौत होने पर मृत्यु भोज नहीं किया। उनका कहना है कि वे खुद सक्षम थे लेकिन गांव में अन्य लोग मजबूरन देखादेखी और अदृश्य दबाव में कर्जा लेकर ऐसे आयोजन होड़ा-होड़ी करते थे। पंच बबीता की इस पहल का प्रभाव बेलाका सहित समीपवर्ती ग्राम पालका व झौपड़ी पर भी पड़ा है। इस नई पहल की चर्चा पूरे जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है।
Published on:
18 Jan 2019 10:21 am
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