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आधुनिकता में खो गए गणगौर के गीत, परंपरा निभाने तक सिमटा पर्व

बुजुर्ग महिलाओं को आज भी याद आती है पहली गणगौर

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आधुनिकता में खो गए गणगौर के गीत, परंपरा निभाने तक सिमटा पर्व

आधुनिकता में खो गए गणगौर के गीत, परंपरा निभाने तक सिमटा पर्व

एक समय था जब गणगौर का पर्व आते ही गली मोहल्लों में गणगौर के गीत सुनाई देते थे। गौर गौर गौमती, गोरिए गणगौर, माता खोल किवाडी के स्वर हर घर से आते थे। बालिकाएं समूह में एक साथ गणगौर की पूजा करती थी, लेकिन अब आधुनिकता के चलते सब कुछ बदल गया है। हमारे पर्व अब परंपरा निभाने तक सिमट गए हैं। अब न गणगौर के गीत सुनाई देते हैं और न ही बालिकाएं गणगौर की पूजा करती नजर आती हैं। अब यह पर्व एक दिन होने वाली गणगौर पूजा तक सिमट गया है। गणगौर के गीत अब किताबों में पढ़े जा रहे हैं और मोबाइल पर सुने जा रहे हैं। बुजुर्ग महिलाओं को आज भी अपनी पहली गणगौर याद आती है। जब गणगौर के लिए नव विवाहिताएं पीहर आती थीं, सखी सहेलियों के साथ आनंदित होकर गणगौर की पूजा करती और गीत गाती थीं। पूजा करते-करते सोलह दिन का यह त्योहार कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता।

16 दिन तक की थी पूजा
70 वर्षीय बुजुर्ग महिला कौशल्या देवी बताती हैं कि मेरी पहली गणगौर मुझे आज भी याद है। 16 दिन तक पूजा की थी। पहले गणगौर आने का बेटियां इंतजार करती थी। पूजा का उत्साह इतना रहता था कि सुबह जल्दी ही तैयारी हो जाती थी। ङ्क्षसजारा की तैयारी खास तौर से की जाती थी। बेटियां खूब मनोरंजन करती थी। अब ना बेटियां ससुराल से आती हैं और न ही 16 दिन की गणगौर पूजा होती है।

पहले जैसा पर्व का अब उत्साह नहीं
काला कुआं निवासी महिला संतोष देवी बताती हैं कि मिट्टी से गणगौर बनाने का भी उत्साह रहता था। सभी सहेलियां मिलकर गणगौर बनाती थी, गीत गाए जाते थे लेकिन अब गणगौर भी बाजार में रेडीमेड आने लगी है। पहले जैसा पर्व का उत्साह अब नहीं रहा है। पहले घर पर महिलाएं गणगौर पूजा के लिए मीठे और नमकीन गुणे बनाती थी लेकिन अब महिलाएं कामकाजी हो गई है। इसलिए वह उत्साह भी खत्म हो गया। अब गुणे की मिठाई भी बाहर से आने लगी है।