
हॉपसर्कस : यहां अलवर की ताजा घटनाओं को पढ़ें अलग अंदाज में, पढक़र आपको आएगा मजा
साहब के साथ जाबा मै डर लागे
एक जमाना था जब साहब के पीछे चलने का रुतबा ही कुछ और था। अजी सलाम की बात तो छोडिय़े, लोग नजराना देने को आतुर रहते थे। साहब भले ही नजराना से मुंह मोड़ लेते, लेकिन अपनी तो मौज बन जाती। अब जमाना बदल गया, जब से जिले में नए हाकिम आए हैं, नजराना तो दूर, सलाम में भी टोटे पड़ गए। दीवारों के कान लगाकर कारण जाना तो पता चला कि जिले के नए हाकिम बाजार में न सलाम लेते न लोगों का नजराना। एक बार तो हाकिम साहब खुद ही बाजार में आम लेने निकल पड़े, साहब ने अर्दली को गाड़ी के पास छोड़ दिया, मोल भाव कर आम खरीद लिए। आम लेकर हाकिम चलने लगे तो अर्दली दौड़ा- दौड़ा आया और आम की थैली उठाने लगा। यह देख बाजार के लोग भी भौचक्के रह गए कि आखिर यह हुआ क्या। सोच विचार के बाद समझ में आया कि आम खरीदने वाले ही खुद हाकिम थे। अब भाई लोग सोचने लगे हैं कि एक-दो बार हाकिम के साथ गए तो बाजार में नजराना तो दूर सलाम में भी टोटे पड़ जाएंगे।
घर का जोगी जोगना और आन गांव का सिद्ध
घर का जोगी जोगना और आन गांव का सिद्ध वाली कहावत सफेद एप्रिन वाले एक साहब पर सटीक बैठती है। इन साहब को पिछले दिनों राजधानी में बुलाकर अच्छे काम के लिए सम्मानित किया गया। इस दौरान उनके काम व तारीफों के पुल बांधे गए। यह बात अलग है कि इन्हीं एप्रिन वाले साहब को कुछ दिन पहले ही गांवों की सरकार की मुखिया ने नोटिस थमाकर नाकारा साबित कर दिया। अब साहब को खाते बन रही है न उगलते, लोगों को सम्मान पत्र दिखाएं या फिर नोटिस को छिपाए। वैसे अपने ही कुछ भाई लोग इन दिनों एप्रिन वाले साहब की कारगुजारियों की चर्चा कर चटकारे लेने में पीछे नहीं है।
नेताजी सामने आए नहीं
किसी खास नौकरी से जुड़े मामले से नेताजी डरते ही रहे। अधिकारी व पार्षदों ने जरूर अपनी-अपनी बात ऊपर रखने में कसर नहीं छोड़ी। गुथमगुथा होने के बावजूद हुआ वही जो होना था। जिनकी किस्मत में नौकरी लिखी उनको मिली। ठगी गई तो जनता। जिनके एक माह से कोई काम ही नहीं हुए। इतना सब कुछ होने के बावजूद बड़े नेताओं ने इस मामलें में चुप्पी साधे रखना ही बेहतर समझा। उनको लगा कि किसी भी तरह की बयानबाजी उल्टी पड़ सकती है। एक तरफ बोले तो अपने की लोग नाराज होंगे। दूसरी तरफ बोले तो काना फूसी से खुद के काम ही अटके रह जाएंगे। जनता की परवाह किसी ने नहीं की। वे अपने कामों के लिए भटकते ही रह गए। जनता भी सब समझती है। समय पर ही
बोलती है।
कार्यालय से तबादला कराके जा रहे स्कूल
पढ़ाई लिखाई वाले महकमें में भी कई भाई लोग मलाई खोज निकालते हैं, तभी तो ऐसे भाई लोग पढ़ाई लिखाई वाले साहब के ऑफिस में जमे रहने के लिए एडी से चोटी का जोर लगा देते हैं। लेकिन इन दिनों पढाई लिखाई महकमे मौसम बदला हुआ है, अब भाई लोग साहब के ऑफिस में जमने के बजाय बच्चों के बीच रहना ज्यादा मुनासिब समझ रहे हैं। तभी तो साहब के ऑफिस में जमे कई बाबूजी ने अपना तबादला स्कूलों में करा लिया। दीवारों के कान लगाए तो सुनाई पड़ा कि साहब के ऑफिस में मलाई की चटाई बिना यहां रहने में मजा नहीं। अब जिन्हें मलाई की चटाई का शौक नहीं उन्होंने अपने बोरी बिस्तर समेट स्कूल का रास्ता पकडऩा बेहतर समझा। अब उन्हें कौन समझाए कि यहां तो कई ऐसे बाबूजी भी हैं जो वापस जाना ही नहीं चाहते हैं। यह बात अलग है कि इनमें से कई तो शाला दर्पण में रिक्त स्थान में ही अपना इंतजाम कर लेते हैं।
सलटाने का तरीका
एक भाईजी ने अपने कुछ विरोधियों को सलटाने के लिए वर्दी वालों से खूब सहयोग ले रहे हैं। एक भाईजी तो लगातार क्षेत्र के ओने पोने विरोधियों को निपटाने के लिए भी इस रौब का सहारा ले रहे हैं। पहले धमकवाते हैं फिर समझौते के लिए दबाव बनवाते हैं। इनके पाले में आए तो ठीक नहीं तो भुगतो। भाईजी के ताबड़तोड़ निर्देशों सेे परेशान ये कारिंदे कई बार तो पहले ही सामने वाले को चेता देते हैं। भाई मजबूरी है, इसलिए दिखावे की कार्रवाई करेंगे। ऐसी भी क्या मजबूूरी? अब उनसे कहो कि फर्ज के आगे चापलूसी भारी क्यों है? इधर, कई चतुर सुजनों ने हवा का रुख भांपकर भाव देना बंद कर दिया है। तो लगे हाथों उनकी शिकायतें भी शुरू हो
गई हैं।
सयानों की माया
कुछ सयानों की माया का पार किसी के पास नहीं है। जहां बैठो वहां उनकी माया का आंकलन शुरू हो जाता है। जितने मुंह उतनी बातें। बिना हींग और फिटकरी लगाए माया का रंग इतना चोखा कैसे हो गया? अब चुगलखोरों से पूछो कि आपको क्या पड़ी है ऐसी पंचायती की। भाई लोगों का हुनर है। इस हुनर को सलाम करें।
Published on:
17 Jul 2018 05:05 pm
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