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इंद्रेश उपाध्याय बोले – ईर्ष्या: भगवत प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा; अलवर में हो रही भागवत कथा

अलवर शहर में श्याम जू सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ जारी है। प्रसिद्ध कथा वाचक इंद्रेश उपाध्याय की ओर से कथा का वाचन किया जा रहा है, जो 23 मार्च तक चलेगा। बुधवार को कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति रस में सराबोर नजर आए।

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कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय

Indresh Upadhyay in Alwar अलवर शहर में श्याम जू सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ जारी है। प्रसिद्ध कथा वाचक इंद्रेश उपाध्याय की ओर से कथा का वाचन किया जा रहा है, जो 23 मार्च तक चलेगा। बुधवार को कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति रस में सराबोर नजर आए।

कथा के दौरान इंद्रेश उपाध्याय ने एक बहुत ही मनोवैज्ञानिक पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हम संसार में अपनों से मिलने की योजनाएं बनाते हैं कि क्या खाएंगे या कहाँ घूमेंगे। लेकिन क्या कभी हमने यह विचार किया कि यदि ठाकुर जी प्रत्यक्ष मिल गए, तो हम उनसे क्या बोलेंगे? क्या संवाद करेंगे? 

उन्होंने भक्तों का आह्वान करते हुए कहा कि भले ही अभी भगवान सामने न हों, लेकिन उनके मिलने की योजना बनाओ। यह विचार ही कि जब प्रभु मिलेंगे तो मैं उन्हें यह खिलाऊंगा या यह बात कहूंगा, धीरे-धीरे भजन बन जाता है। यही योजना भक्त को भगवत प्राप्ति के मार्ग तक ले जाती है।

कथा वाचक ने धर्म की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए कहा कि कुल खानदान की मर्यादा और शरीर के स्तर पर किए गए कर्म धर्म हैं। लेकिन, जब व्यक्ति एकांत में बैठकर अपनी अंतरात्मा के उद्धार का चिंतन करता है, तो वह परम धर्म कहलाता है। नाम, धन, यश और समृद्धि कमाना धर्म के अंतर्गत आता है, जबकि यह विचार करना कि जीवन के कुछ दिन बचे हैं और इस दिव्य चेतना को परमात्मा से मिलाना है, परम धर्म है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रामायण और महाभारत हमें धर्म सिखाते हैं, लेकिन श्रीमद् भागवत हमें परम धर्म की ओर ले जाती है।

ईर्ष्या: भगवत प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा

इंद्रेश उपाध्याय ने ईर्ष्या के त्याग पर जोर दिया। उन्होंने रावण का उदाहरण देते हुए कहा कि रावण में काम, क्रोध और लोभ जैसे विकार थे, फिर भी उसे राम जी के दर्शन हुए क्योंकि उसके मन में राम के प्रति ईर्ष्या नहीं थी। उन्होंने कहा कि भगवान अन्य दोषों के बावजूद मिल सकते हैं, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को ठाकुर जी कभी प्रिय नहीं होते। पांडाल में बैठे लोगों को उन्होंने कहा कि आज अधिकांश लोगों के मन में ईर्ष्या घर कर गई है, जिसे भजन के माध्यम से नष्ट करना अनिवार्य है।