
सरिस्का पर भारी पड़ रही है अलवर के मावे की मिठास, मावा बनाने के लिए इस तरह कर रहे सरिस्का का नुकसान
देश में मावा उत्पादन में अलवर भले ही अग्रणी स्थान बना चुका है, लेकिन मावे की यह मिठास सरिस्का को भारी पड़ रही है। बड़े पैमाने पर मावा उत्पादन का नतीजा है कि सरिस्का की खास पहचान रही धोक अब लुप्त प्राय: हो चुकी है।
सरिस्का एवं आसपास बसे दो दर्जन से अधिक गांवों में मावा उद्योग तेजी से पनपा है। अलवर जिले में हर दिन तैयार होने वाले मावे का ज्यादातर हिस्सा सरिस्का क्षेत्र के गांवों में तैयार हो रहा है। दुर्गम पहाड़ी व अन्य स्थानों पर बसे ज्यादातर गांवों में पशुपालन ही ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय है। इन गांवों का जिला मुख्यालय व शहरी क्षेत्रों से सीधा जुड़ाव नहीं हो पाने के कारण ज्यादातर ग्रामीण दूध का मावा तैयार बाजार में बेचने को ले जाते हैं।
बड़ी मात्रा में होती है ईंधन की जरुरत
सरिस्का क्षेत्र में दूध से मावा बनाने के लिए हरे धोक की बड़े पैमाने पर कटाई हो रही है। दूध से मावा बनाने के लिए बड़ी मात्रा में ईंधन की जरूरत होती है। वहीं सरिस्का क्षेत्र में रसोई गैस आदि की इतनी मात्रा में आपूर्ति संभव नहीं है। इस कारण ग्रामीण सरिस्का में धोक व अन्य पेड़ों की जबरन अवैध कटाई से नहीं घबराते। यही कारण है कि सरिस्का में इन दिनों धोक के पेड़ गिने चुने ही दिखाई पड़ते हैं।
वनकर्मियों की कमी का मिलता है लाभ
सरिस्का पहले ही वनकर्मियों की कमी से जूझ रहा है। सरिस्का की 102 बीटों पर करीब 106 वनकर्मी नियुक्त हैं। इनमें भी एक तिहाई करीब 35 महिला वनकर्मी हैं।
वहीं कुछ वनकर्मी टाइगर की मॉनिटरिंग टीम में शामिल होने के कारण जंगल की रखवाली के लिए नाम मात्र के वनकर्मी बचते हैं। ऐसे में मावा उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर हो रही हरे धोक के पेड़ों की कटाई पर रोक नहीं लग पा रही है।
नि:शुल्क गैस कनेक्शन से भी नहीं रुकी
सरकार ने उज्जवला योजना के तहत सरिस्का के आसपास के गांवों में रहने वाले परिवारों को निशुल्क गैस कनेक्शन जारी किए। बड़ी संख्या में गैस कनेक्शन दिए जाने के बाद भी सरिस्का में हरे पेड़ों की समस्या यथावत है।
ग्रामीण गैस कनेक्शन का उपयोग करने के बजाय सरिस्का से पेड़ काट चूल्हे पर खाना बनाते हैं। वहीं दूध से मावा बनाने में भी लकडिय़ों का उपयोग करते हैं। कई ग्रामीणों ने तो गैस कनेक्शन रिश्तदारों को दे दिए या फिर दूसरे लोगों को बेच तक दिए।
ग्रामीणों व सरिस्का प्रशासन में हो चुके हैं विवाद
धोक व अन्य हरे पेड़ों की बड़े पैमाने पर हो रही कटाई से सरिस्का की ख्याति को ही बट्टा लगने लगा है। पेड़ों की अवैध कटाई के चलते पूर्व में कई बार ग्रामीणों व सरिस्का प्रशासन के बीच विवाद हो चुका है। वहीं कई बार ग्रामीणों के खिलाफ अवैध पेड़ कटाई के मामले भी दर्ज किए गए हैं। इसके बाद भी सरिस्का में पेड़ों की अवैध कटाई पर रोक संभव नहीं हो पा रही है।
बड़ी समस्या है
सरिस्का में धोक व हरे पेड़ों की कटाई बड़ी समस्या है। पेड़ों की कटाई रोकने के लिए परियोजना क्षेत्र के गांवों में सरकार ने निशुल्क गैस कनेक्शन भी उपलब्ध कराए। गांवों में दूध से मावा बनाने में बड़ी मात्रा में ईंधन की जरूरत पडऩे से पेडों की कटाई पर रोक लगाना समस्या बन गई है।
डॉ. जीएस भारद्वाज, सीसीएफ, सरिस्का बाघ परियोजना
Published on:
11 Aug 2018 10:32 am
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