
अलवर. गर्मी से राहत पाने के लिए लोग ठंडे खान-पान की वस्तुओं का जमकर सहारा लेने लगे हैं। कुछ समय से पाश्चात्य संस्कृति व आधुनिकता के प्रभाव के चलते युवा पीढ़ी खान-पान के परम्परागत देसी ठाठ को भूलकर कई तरह के पेय पदार्थों की ओर लालायित हुए और शरीर को पोष्टिकता व ऊर्जा प्रदान करने वाले मोटे अनाज के महत्व को भूल गए। बच्चों का ध्यान शीतल पेय, केमिकल से बनने वाले जूस की तरफ चला गया, पर यह न गर्मी से राहत दिला पाए और न ही शरीर को कोई लाभ पहुंचा सके।...आखिर सुबह का भटका शाम को घर लौट आया ... वाली बात को अब सही साबित करते नजर आ रहे है। यह अच्छा भी है। बुजुर्गों के साथ अब युवा पीढ़ी को भी सत्तू, घाट की राबड, जौ की धानी के स्वाद का चाव लग रहा है। इनका वे जमकर लुत्फ ले रहे हैं। जिससे न केवल उन्हें गर्मी से राहत मिल रही है, बल्कि शरीर को भी पौष्टिकता प्रदान कर रहे हैं।
बन गए थे दादा-दादी व नानी की कहानी
करीब डेढ़-दो दशक से मोटे अनाज के खान-पान की रसाल दादा-दादी व नानी की कहानी से बन गए थे। बच्चों को वे आज भी बताते हैं कि पहले घरों में नानी, दादी बच्चों को गर्मी से बचाने वाले गुणकारी जौ व चने का कितना महत्व होता था। नानी-दारी बड़े दिनों में भूख मिटाने को भुने हुए चने, जौ की धानी और गर्मी से ठंडक पाने के लिए घाट की राबडी, सत्तू, गुलकंद , कच्चे आम का मुरब्बा आदि खिलाया करती थीं और भड़भूजों के भाड़ पर जौ की धानी व चने को भुनवाने के लिए भारी भीड़ लगी रहती थी, लेकिन बदलते समय व आधुनिकता के प्रभाव के कारण न केवल ये भाड़ बंद हो गए, युवा पीढ़ी व बच्चे भी इन गुणकारी चीजों को खाना तो दूर, बल्कि नाम तक नहीं जानते हैं। अब फिर से इनका महत्व समझ में आने लगा है और लोग इन्हें उत्सुकता से अपनाने लगे हैं।
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बाजार में फिर से बना रहे अपनी पैंठ
कुछ समय से गर्मी के दिन आते ही बाजार में तरह-तरह की आईसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक एवं अन्य हानिकारक पदार्थों ने इनका स्थाल ले लिया, जो शरीर के लिए अनेक बीमारियों का कारण बन रहे हैं। अब फिर से सत्तू, घाट की राबडी, जौ की धानी बाजार में अपनी पैंठ जमाने लगे हैं और इनके स्वाद का लोगों को चाव भी लग रहा है।
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परोस रहे डिस्पोजल गिलास में
बाजार के व्यस्ततम क्षेत्र के चौक-चौराहों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड व इनके आसपास ठेलों पर मटकी में छाछ व राबड़ी का घोल तैयार मिल रहा है। इन्हें अलग-अलग साइज के डिस्पोजल के गिलास में भरकर बेजा जा रहा है। इनकी कीमत भी अलग-अलग है। छोटे साइल वाले गिलास की 10 रुपए बड़े साइज के गिलास की 20 रुएए और इससे बड़े साइज वाले की 30 रुपए तक लिए जा रहे हैं।
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लोगों को समझ में आ रहा महत्व
मनीष भड़भूजा का कहना है कि भाड़ चलाने के लिए सरसों की तूडी की आवश्यकता होती थी। सरसों की तूड़ी को किसान भी पहले अनुपयोगी मानकर खेतों में ढेर को पड़ा छोड़ देते थे। जिसे मवेशी खाते या बिखेरते रहते थे। डेढ़-दो दशक पूर्व खेतों के मालिक तूडी को नि:शुल्क मंदिरों के जीर्णोंद्धार के लिए दे दिया करते थे, लेकिन अब इस तूडी का व्यावसायिक उपयोग ईंट-भट्टे आदि में उपयोग होने के चलते इसका व्यापार होने लगा है। इसे अच्छे दाम मिल रहे हैं। किसानों के लिए सरसों की फसल आम के आम और गुठली के भी दाम देने लगी है, जिससे भाड़ चलाने में दिक्कत होने लगी। अतंत: अधिकतर भाड़ बंद ही हो गए।
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कई तरह से लाभदायी
सविता खंडेलवाल का कहना है कि आज के बच्चे गुणकारी सत्तू, गुलकंद, घाट की राबडी आदि के नाम ही नहीं जानते। वे उत्सुकता से पहुंच लेते हैं कि यह कैसे बनते हैं। इनके लाभ जानते है। समझाने पर उनमें इन्हें पाने की जिज्ञासा और बढ़ जाती है। कुछ दशकों में भले ही इनसे मुंह मोड़ कर कोल्ड ड्रिंक, कैन, केमिकल से बने जूस, आईसक्रीम आदि की तरफ भागे, लेकिन अब फिर से देसी ठाठ के खान-पान की ओर हर वर्ग के लोगों का रूझान गर्मी के आते ही बढ़ने लगा है। इनका महत्व समझ में आ रहा है। यह शरीर के लिए कई तरह से लाभदायी है।
Updated on:
10 May 2024 03:35 pm
Published on:
09 May 2024 08:22 pm
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