
फाइल फोटो (फोटो - पत्रिका)
रूपारेल नदी को पुनर्जीवित करने की बड़ी-बड़ी बातें इस समय सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं। नदी को नया रूप देने के लिए लाखों रुपये खर्च कर ड्रोन सर्वे करवाया गया था। इस सर्वे का मकसद नदी की जमीनी हकीकत जानना और रुकावटों का पता लगाना था। सर्वे करने वाली एजेंसी ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट (डीपीआर) करीब डेढ़ महीने पहले ही सिंचाई विभाग के अधिकारियों को सौंप दी थी। उम्मीद थी कि इसके तुरंत बाद काम तेजी से आगे बढ़ेगा, लेकिन विभाग की कछुआ चाल के कारण यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट अब तक फाइलों में ही दबी पड़ी है।
नियम के मुताबिक, डीपीआर मिलने के बाद सिंचाई विभाग को एक विशेष जांच कमेटी का गठन करना था। इस कमेटी का काम रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करना और फिर मौके पर जाकर ड्रोन के दावों का जमीनी मिलान यानी फिजिकल वेरिफिकेशन करना था। हैरानी की बात यह है कि डेढ़ महीने बाद भी न तो इस कमेटी का अता-पता है और न ही मौके पर जाकर जांच शुरू की गई है। प्रशासनिक स्तर पर हो रही इस लापरवाही से इस बेहद जरूरी प्रोजेक्ट की रफ्तार पूरी तरह थम गई है।
चिंता की बात यह है कि अलवर जिले में प्री-मानसून ने दस्तक दे दी है। मौसम विभाग के मुताबिक जल्द ही भारी बारिश का दौर शुरू होने की संभावना है। अगर एक बार मानसून पूरी तरह सक्रिय हो गया और नदी क्षेत्र में पानी भर गया, तो जमीनी सर्वे करना और भी मुश्किल हो जाएगा। पानी भरने के बाद मौके पर जाकर निरीक्षण करना और अतिक्रमणों की सही स्थिति का पता लगाना नामुमकिन हो जाएगा। ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया में कई महीनों की और देरी होना तय माना जा रहा है।
इस प्रोजेक्ट के तहत सिंचाई विभाग को नदी के पूरे बहाव क्षेत्र का बारीकी से आकलन करना है। टीम को यह देखना है कि रूपारेल नदी किन-किन जगहों पर भू-माफियाओं और अतिक्रमण की चपेट में है। साथ ही उन स्थानों की पहचान की जानी है जहां पानी का प्राकृतिक रास्ता रोक दिया गया है। इस काम में राजस्व विभाग की मदद भी ली जानी है। चूंकि यह योजना सरकार की बजट घोषणा में शामिल है, इसलिए आगे का बजट और जरूरी मंजूरियां इसी रिपोर्ट की जांच के बाद ही मिलेंगी। लेकिन अफसरों की इस लापरवाही से अब सरकार की मंशा पर भी पानी फिरता दिख रहा है।
Updated on:
23 Jun 2026 12:10 pm
Published on:
23 Jun 2026 12:09 pm
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