
After Chandnath ready for old battle in BJP alwar
अलवर.
लम्बी बीमारी के बाद सांसद व बाबा मस्तनाथ मठ के महंत चांदनाथ ब्रह्मलीन हो गए। अब इधर अलवर की राजनीति में खासकर भाजपा के पाले में उठापटक होना तय माना जा रहा है। मतलब अभी तक अलवर में भाजपा के नेता चुपी साधे हुए थे, जो अब वापस जागने जा रहे हंै। जिसका प्रमुख कारण आगामी लोकसभा क्षेत्र अलवर का उप चुनाव है।
अभी तक यह सीट बाबा के हाथ में होने से जिले के भाजपा नेता शांत रहे। इसलिए कि बाबा को टिकट दिलाने में जिले के नेताओं की कोई विशेष भूमिका नहीं थी, लेकिन अब वापस जिले के भाजपा नेताओं में वापस वर्चस्व की लड़ाई शुरू होना तय है। वैसे भी यहां के भाजपा नेताओं की लड़ाई हर बड़े चुनाव में खुलकर सामने आती रही है। चाहे पुराने लोकसभा चुनाव हों या जिला प्रमुख के चुनाव। भाजपा के धड़ेबाज नेता अपना रुतबा बनाए रखने में पार्टी की रीति-नीतियों को भी ताक पर रखते रहे हैं।
बदलेगी राजनीति, होगा सेमीफाइनल चुनाव
प्रदेश में अजमेर के साथ अब अलवर लोकसभा सीट पर भी उप चुनाव होना तय है। यह चुनाव आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल माना जाने लगा है। उपचुनाव राजस्थान की राजनीति को करवट भी दे सकता है। खास बात यह है कि अजमेर व अलवर दोनों लोकसभा सीटों पर कांग्रेस के दिग्गजों को दुबारा से मौका मिल सकता है। पहले चुनाव में अलवर से पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह और अजमेर से प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट चुनाव हार गए थे।
उप चनाव के परिणाम दोनों प्रमुख दलों के लिए देश व प्रदेश की राजनीति में खासा महत्व रखते हैं। यह भी सही है कि इन उप चुनावों में भाजपा के प्रदेश ही नहीं देश के दिग्गजों की नजर रहेगी। उल्लेखनीय है कि अजमेर लोकसभा सीट से पूर्व केंद्रीय मंत्री सांवरलाल जाट का भी निधन हो चुका है। माना जा रहा है कि आगले साल जनवरी या फरवरी माह में राजस्थान में उप चुनाव हो सकते हैं। फिर वर्ष २०१८ में दिसम्बर माह तक विधानसभा के चुनाव भी कराए जाने हैं।
दोनों ही सीटें भाजपा की
महंत चांदनाथ ने जहां राहुल गांधी के खासमखास माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह हराया वहीं सांवरलाल जाट ने राजस्थान में मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल और पूर्व दिग्गज राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट को हराया था। ऐसे में अब होने वाला उपचुनाव कई मायनों में खास रहेगा।
मौत से अधिक चुनाव पर चर्चा
सांसद महंत चांदनाथ का निधन होने के बाद आगामी चुनावों को लेकर जनता में अधिक चर्चा रही। सब अपने-अपने हिसाब से नेताओं को अगले प्रत्याशी मान रहे हैं। दिन भर सोशल मीडिया पर भी इसकी खूब चर्चा रही।
विधायकों का खेमा आपस में बंटा हुआ
अलवर जिले में भाजपा के विधायकों मुख्य रूप से दो बड़ धड़े हैं। राजनीति में थोड़ी बहुत भी रुचि रखने वाले और आम कार्यकर्ता भी उससे वाकिफ हैं। दो या तीन विधायक व पार्टी के कुछ पदाधिकारी बिना धड़े के चलते हैं। अपने काम निकालने के लिए जरूरत के अनुसार मंत्री व नेताओं के बीच में उपस्थिति बनाए रखते हैं। बाकी पूरी उठापटक को एक मैच की तरह देखते रहते हैं। पूरा एन्जॉय करते हैं।
जिला प्रमुख के चुनाव सबके सामने
दो चुनावों में पार्टी की बड़ी फूट सामने आ चुकी है। एक बार किरण यादव के सांसद के चुनाव में दूसरा मौजूदा जिला प्रमुख वाले चुनाव में। जिला प्रमुख के चुनाव में भाजपा के पास बहुमत से ज्यादा पार्षद थे, लेकिन जीता कांग्रेस प्रत्याशी। यह सबको पता कि इतना बड़ा उलटफेर एक ही नेता ने कर दिया। इस नेता ने सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराया। उनको बाद सरकार को मंत्री भी बनाना पड़ा। अब फिर से उन्हीं नेताओं की धड़ेबंदी सामने आना तय माना जा रहा है। हालांकि दूसरा धड़ा इस समय सरकार में ज्यादा बड़ा वजूद नहीं रखता है, लेकिन अब वे खुद के लम्बे राजनीतिक अनुभवों से कैसा खेल खेलेंगे। इसकी शुरुआत उनके जहन में हो चुकी है। यह सब जनता तक आने में भी ज्यादा समय नहीं लगेगा।
ज्यादा लडा़ई दो के बीच
जिले में दो नेताओं के बीच बड़ी लड़ाई चलती रही है। कभी जिला प्रमुख में आमने-सामने होते हैं तो कभी लोकसभा के चुनाव में। उनके तरकश से तीर हर उस मंच से निकलते हैं जो एक-दूसरे के वोटर को प्रभावित करने वाले होते हैं। तभी तो पिछले दिनों सरकार ने दोनों का राजी किया।, ताकि यह लड़ाई खत्म हो। एक को कैबिनेट मंत्री बनाया। दूसरे को कैबिनेट मंत्री का दर्ज दिया गया, लेकिन फिर भी उनकी लड़ाई कम नहीं हुई। इसके बाद भी बहरोड़ व बानसूर को रण क्षेत्र बना लिया। एक-दूसरे के नहीं चाहने पर वहां बड़े स्वागत समारेाह के कार्यक्रम हुए। जमकर खींचतान हुई।
अब तक के सांसद
वर्ष 1951 में शोभाराम, 1957 में शोभाराम, 1962 में काशीराम, 1967 में बी नाथ, 1967 में हरी प्रसाद, 1977 में रामजीलाल यादव, 1980 में रामसिंह यादव, 1984 में रामसिंह यादव, 1989 में रामजीलाल यादव, 1991 में महेंद्रा कुमारी, 1996 में नवल किशोर, 1998 में घासीराम यादव, 1999 में डॉ. जसवंत यादव, 2004 में डॉण्. करण सिंह यादव, 2009 में भंवर जितेंद्र सिंह तथा वर्ष 2014 में महंत चांदनाथ अलवर लोकसभा सीट से सांसद रहे।
Published on:
18 Sept 2017 12:25 pm
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